‘बस्तर 2.0’ पर सियासी जंग तेज! Vishnu Deo Sai के दावों पर विपक्ष का हमला—जल, जंगल या उद्योग… आखिर सच क्या?


छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘बस्तर 2.0’ को लेकर अब खुली जंग छिड़ गई है। एक तरफ सरकार विकास और नक्सलवाद के खात्मे का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इन दावों पर सवालों की बौछार कर रहा है। ऐसे में बस्तर एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है।

मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने अपने सुकमा दौरे के दौरान जिले को 308 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात दी और ‘नियद नेल्लानार 2.0’ योजना को बस्तर के 10 जिलों तक विस्तार देने का ऐलान किया। सरकार का कहना है कि नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद अब बस्तर तेज विकास की राह पर है।

लेकिन इसी बीच विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। Deepak Baij ने कई तीखे सवाल उठाते हुए पूछा है कि बस्तर में शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के सैकड़ों खाली पद कब भरे जाएंगे? नक्सल सहयोग के आरोप में सालों से जेल में बंद हजारों आदिवासियों को कब रिहा किया जाएगा?

विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब सामान्य हो चुके हैं, तो उनके लिए विशेष पैकेज कब घोषित होगा? साथ ही सबसे बड़ा मुद्दा यह उठाया गया कि क्या सरकार यह गारंटी दे सकती है कि बस्तर के जल, जंगल और जमीन निजी उद्योगपतियों को नहीं सौंपे जाएंगे?

इतना ही नहीं, NMDC मुख्यालय को बस्तर लाने और दल्लीराजहरा-जगदलपुर रेल लाइन शुरू करने जैसे पुराने वादों को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा गया है।

इन आरोपों पर सत्तापक्ष ने भी तीखा पलटवार किया है। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि अगर कांग्रेस में इच्छाशक्ति होती, तो प्रदेश से नक्सलवाद पांच साल पहले ही खत्म हो चुका होता। वहीं बीजेपी विधायक Purandar Mishra ने आरोप लगाया कि नक्सलवाद खत्म होने से कांग्रेस खुश नहीं है, क्योंकि इससे अवैध गतिविधियों पर रोक लगी है।

अब इस सियासी टकराव के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—क्या ‘बस्तर 2.0’ वास्तव में विकास का नया अध्याय है या फिर यह सिर्फ राजनीतिक श्रेय लेने की जंग बनकर रह जाएगा?

जनता के लिए असली मुद्दा अभी भी वही है—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपने संसाधनों पर अधिकार। अब देखना यह है कि सरकार इन सवालों का ठोस जवाब देती है या सियासत का यह संग्राम और तेज होता जाएगा।