ये सरगुजा है छत्तीसगढ़ का सरगुजा

ये सरगुजा है छत्तीसगढ़ का सरगुजा। कहा जाता है कि यहां जो भी आता है वो यहीं का हो कर रह जाना चाहता है। ये इसलिए भी शायद संभव  है कि यहां का मौसम ,वातावरण और यहां के लोगों का भोलापन ही है जिसे देखकर यहां आने वाला यहीं का हो कर रह जाना चाहता है। ऐसा सिर्फ पर्यटकों के साथ होता तो यह बात सरगुजा के लिए गर्व करने वाली होती लेकिन यदि कोई अधिकारी यहां 22 साल पहले पदस्थ हो कर आया हो और उसके बाद यहां से जाने के सारे नियम कायदों को ठेंगे पर रख अपनी आने वाली पीढ़ियों का  भविष्य संवारने की व्यवस्था ही कर चुका हो तो फिर ये बात सरगुजा जिले वासियों के लिए गर्व करने की नहीं बल्कि चिंता करने का विषय बन जाता है।

ये कहानी है एक ऐसे अधिकारी की, जिसने नियम-कायदों को अपनी जेब की किताब बना लिया है।
नाम है एस.पी. कुमार सत्य प्रकाश कुमार । पद है कार्यपालन अभियंता। और पदस्थापना, पूरे बाइस साल से एक ही जिले के एक ही शहर में !  यानी सरगुजा के अंबिकापुर शहर में। पूरे 22 साल जबकि इनके ही विभाग , की स्थानांतरण नीति साफ कहती है कि तीन साल से ज़्यादा एक जगह कोई अधिकारी नहीं रहेगा। लेकिन कुमार साहब  हैं कि  मलाईदार कुर्सी से ऐसे चिपके हैं जैसे दीमक पुरानी लकड़ी से चिपक जाती है !

आखिर ऐसा कौन-सा जादू है ?ऐसा क्या कुर्सी का मोह है?कौन-सा वरदान है?कि कोई  उच्च अधिकारी या  सरकार इनका कुछ नहीं  बिगाड़ पाती है. अब तो सुनने में यह भी आ रहा है की प्रमोशन का जुगाड़ भी तय  कर लिया गया है।यानी प्रमोशन भी होगा और फिर से यही टिके रहेंगे और रिटायरमेंट तक सरगुजा में कुर्सी से ही चिपके रहेंगे ! कहानी केवल यह नहीं है कि कुमार साहब का अंबिकापुर में ही  22 वां साल है  दरअसल कहानी इससे भी आगे बढ़ चुकी है,,,कि इनके ऊपर घोटालों के आरोप लगे ठेकेदारी में रोल लेने की बातें उठीं
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। शहर में आलीशान फ्लैट शानदार फार्महाउस ।

जमीन-जायदाद का जाल भी है। सवाल ये है कि ये सब कुछ क्या सिर्फ सरकारी वेतन से ही कुमार साहब ने अर्जित किया है? क्या लंबे समय तक जमे रहने का फायदा उठाकर सिस्टम को निचोड़ा नहीं गया ?

इतना ही नहीं सूत्रों की माने तो लाखों -करोड़ों रुपयों  तक के कमीशन लेने की चर्चाएँ काफी तेजी से  सरगुजा की गलियों से लेकर मंत्रालय तक गूंजता रहा। हद तो तब हो गई जब 24 अक्टूबर 2024 को इन्हें एक  आरोप पत्र जारी हुआ और  29 नवंबर 2024 को कुमार साहब ने अपना जवाब दिया । जांच पूरी हुई। और 6 अगस्त 2025 को रायपुर से आदेश आया जिसमें इनके भ्रष्टाचार के  मामले पर इन्हे ”मात्र  चेतावनी”  दी जाती है और प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया जाता है यानी न लापरवाही का दंड, न नीति उल्लंघन की सजा, न स्थानांतरण। बस  एक कागज़ की चेतावनी और मामला खत्म।

सोचिए, 22 साल से एक ही जिले में जमे रहने का इनाम है  चेतावनी! क्या यही है छत्तीसगढ़ की बिजली कंपनी का अनुशासन?यानी भ्रष्टाचार सिद्ध हुआ लेकिन सज़ा नही बस प्यार से कान पकड़कर कह दिया — “बेटा आगे से मत करना !”और फिर खेल ख़त्म ! अब सवाल ये है कि, छत्तीसगढ़ में बिजली कंपनियों की पॉलिसी ‘अंबिकापुर ‘ में पदस्थ  एसपी कुमार जैसे अधिकारी पर लागू क्यों नहीं होती है? या फिर सरगुजा में ऐसा कौन सा ‘स्वर्ग’ बसा है कि अफ़सर ”’कुर्सी”’ छोड़ने का नाम ही नहीं लेते? पूरे प्रदेश में विद्युत विभाग 8 जोन में बंटा हुआ है ,रायपुर -शहरी -ग्रामीण ,जगदलपुर क्षेत्र ,दुर्ग ,क्षेत्र ,राजनांदगांव ,बिलासपुर,रायगढ़ ,और अंबिकापुर जिसमें से सरगुजा सबसे बड़ा और सबसे अधिक मलाईदार जोन में गिना जाता है।

तभी तो यहां आया हुआ हर अधिकारी फिर चाहे वो किसी भी विभाग का हो आता है ,60 –70 किलो के वजन के साथ लेकिन जब जाता है, अव्वल तो जाता ही नहीं है, फिर भी यदि गलती से चला गया तो जाते वक्त उसका वजन 100 किलो से अधिक हो गया होता है। क्योंकि यहां के आदिवासी जनता के हक को दबा के खाने की खुली छूट प्रशाशन की ओर से मिली होती  है। क्योंकि जो अधिकारी 22 साल से एक ही जिले  के एक ही शहर में जमे रहकर अपना साम्राज्य खड़ा कर चुका हो, उसके लिए विभाग की पॉलिसी क्या और कानून क्या… सब महज़ औपचारिकता बनकर रह जाती है और जब जनता सवाल पूछती है… तो जवाब में आदेश आता है— “चेतावनी”। भ्रष्टाचार का पहाड़, कुर्सी से चिपके रहने की हद, जमीन-जायदाद का साम्राज्य-  और बदले में बस चेतावनी ! यही है प्रशासनिक सख्ती ?
सरगुजा अब एक जिले का नाम नहीं रह गया बल्कि कुछ अफसरों के लिए ‘स्वर्णभूमि’ बन चुका है। जहां वेतन से ज्यादा मलाई, और नियम से ज्यादा रसूख काम करता है। दरअसल आम जनता को इन सबसे कोई सरोकार भी नहीं ,,की कौन सा अधिकारी कितने समय से ,,यहाँ टिका हुआ है हमें सिर्फ बिजली और बिजली बिल से मतलब होता है ,पर बिजली बिल की  कीमत क्यों बढ़ रही है , इन कारणों पर विचार नहीं करते।  विडंबना ये देखिए कि इसी सरगुजा के महाराजा कहे जाने वाले टी.एस. सिंहदेव तक अपनी कुर्सी पाँच साल से ज़्यादा समय,,, तक नहीं बचा सके,और दूसरी तरफ़ इसी सरगुजा में कोई ‘परदेशी’ अफसर पूरे 22 सालों से अपनी कुर्सी पर जमा हुआ है। क्या ये किसी चुटकुले से कम लगता है?”
फिलहाल अब तक जो भी तथ्य आपके सामने हमने रखे हैं उससे यही साबित होता है कि आज के समय में जितने भी कानून हैं नियम हैं वो सब एसपी कुमार जैसे सिस्टम के दीमक  के आगे दम तोड़ देते हैं। वहीं
अगर कोई साधारण कर्मचारी नियम तोड़ दे तो उसी वक्त उसका सस्पेंशन आदेश जारी हो जाता है, सैलरी काट ली जाती है और मामला कोर्ट-कचहरी तक चला  जाता है। लेकिन जब बात रसूखदार अफसरों की आती है तो वही सिस्टम कान में तेल डालकर सो जाता है।सच यह है की  ये छत्तीसगढ़ का  सुशासन का मॉडल है ?कमजोर को तो चिमटी से दबा दो लेकिन ताकतवर के लिए पूरा कानून बौना साबित हो जाए .! सवाल अब सिर्फ़ एस.पी. कुमार तक सीमित नहीं है, सवाल है उस पूरे सिस्टम से, जो ऐसे अफसरों के लिए ढाल बनकर खड़ा है। सवाल है सरकार से, कि आखिर क्यों नियम-कायदे सिर्फ़ आमजनों और छोटे कर्मचारियों के लिए बनाए गए हैं?और सबसे बड़ा  सवाल यह है कि क्या सरगुजा वाकई छत्तीसगढ़ का हिस्सा है या फिर यहां कोई और ही रियासत चल रही है, जहां कुर्सी के खेल में नियम, नीति, न्याय सब बलि चढा दिए जाते हैं !