अंबिकापुर : 03/04/2026 को अंबिकापुर में एक महिला की नृशंस हत्या ने समाज को दहला कर रख दिया है। यह हत्याकांड़ नशा,कुंठित सेक्स उन्नमाद व लिव इन-रिलेशन जो आज सभ्य समाज में प्रतिष्ठा का मानक बन चुका है,के त्रिकोणीय द्वंद की घृणित परिणिती है।
लेकिन इस दुर्लभतम् रूप से कारित नृसंशता, एकाएक घटित नहीं होती बल्कि,पूर्व इसे निरतंर प्रेरित करने वाले बुनियादी तत्व भले ही अलग-अलग हो,लेकिन मिलते एक ही जगह पर है जिसका नाम है नशा ।
अंबिकापुर में विगत कई वर्षो से भिक्षाटन ,कचरा व कबाड़ बीन कर जीवकोपार्जन करने वाले सभी वर्ग अप्राप्तव्य,नवयुवक, महिला व पुरूष शामिल है।लेकिन इनका संबध अशिक्षा ,बेरोजगारी या एंजिल के नियम से परे नशाखोरी,नशा प्राप्त करने के तरीको,व लक्षित नशा और उसके उपभोग से सबंधित है।और यह कचरा ,कबाड़ इकट्ठा करना और भिक्षाटन इस नशा प्राप्ति के आर्थिक संसाधन के रूप मे विकसित एक यंत्र है।
आज सरगुजा में नशा के स्वरूपो में व्यापक परिवर्तन आया है।नारकोटिक्स विभाग द्वारा वर्गीकृत सभी प्रकार के नशा जैसे ।
उत्तेजक नशा,(मेथामफेटामाइन)अवसादक नशा(शराब,नींद की गोलियां),मादक पदार्थ(अफीम ,हेरोइन) मतिभ्रम पैदा करने वाले(गांजा,भांग) और इनहेलेंट नशा(पेंट थिनर, सुलेशन,गैसोलीन) इत्यादि चोरी छिपे मिल रहे है।
अंबिकापुर के उक्त नृसंश हत्याकांड़ के पीछे सेक्स उत्कंठा और नशा जनित उत्तेजना ही मुख्य कारण प्रतीत होता है। यह हत्या सेक्शुअल सैडिज्म,( यौन उत्तेजना,में अत्यधिक शारीरिक व मानसिक पीड़ा देना) इरोटोफोनोफिलिया अर्थात यौन उत्तेजना की संतुष्टि के लिए हत्या ,और नेक्रोसेडिज्म अर्थात हत्या के बाद शव के यौवनांगो के साथ क्रूरतम छेड़छाड करना ,का एकीकृत रूप दिखाई देता है।
यह हत्या पुलिस की जाबदेही नहीं, बल्कि स्वंय को सभ्य कहने वाले कथित समाज के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा और मुंह पर कालिख है।पुलिस किसी को सिर्फ मानसिक अपराध के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती जब तक की वह प्रगट न हो। यह सामाजिक व्याधि है।
कहां गये वे सभ्य महिला व पुरूषों का भेंड झुंड़ जो चेहरे पर सौदर्य लेपन ,व सूट और टाई पहन कर स्त्री सुरक्षा के नाम पर मोमबत्ती जला कर सामाजिक और राजनैतिक रंडरोवन करते है?क्या इस मृतक महिला के प्रति ऐसी संवेदना प्रगट नही करेगे?
समाज के सामाजिक नैतिक मूल्यों की रक्षा सिर्फ पुलिस नही कर सकती है।इसके लिए समग्र सामाजिक चेतना के जागृति की आवश्यकता है। जिसका आभाव हमारे समाज में पर्याप्त है,और यह नृसंश हत्या इसी सामाजिक निर्वात की कुत्सिस परिणिती है।
