अंबिकापुर, 18 मार्च।
क्या देश में “विधि का शासन” सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है? सरगुजा जिले के प्रतिष्ठित सैनिक स्कूल अंबिकापुर से जुड़ा एक मामला इन दिनों कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला केवल एक कर्मचारी की नौकरी का नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों की अनदेखी और प्रशासनिक हठधर्मिता का बन चुका है।को
र्ट का साफ आदेश… फिर भी टल रहा पालन
पूरा विवाद पूर्व ऑफिस सुपरिंटेंडेंट जयंत कुमार सिंह की सेवा समाप्ति से शुरू हुआ। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 11 सितंबर 2024 को इस बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए तत्काल पुनःस्थापना का आदेश दिया।
इतना ही नहीं, संस्थान द्वारा दायर अपील को भी 22 नवंबर 2024 को डिवीजन बेंच ने खारिज कर दिया। फिलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय में है, लेकिन वहां से अब तक कोई स्थगन आदेश (Stay) नहीं मिला है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब स्टे नहीं है, तो आदेश लागू क्यों नहीं हो रहा?
“10 साल की साजिश” का सनसनीखेज आरोप
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जयंत कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि उन्होंने संस्थान में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर किया, जिसके बाद उन्हें निशाना बनाया गया।
आरोपों के मुताबिक:
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उन्हें नौकरी से हटाने के साथ-साथ
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मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ने की कोशिश की गई
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और पूरे मामले को एक दशक तक जानबूझकर खींचा गया
यह मामला अब एक प्रशासनिक विवाद से बढ़कर व्यक्तिगत प्रतिशोध और संस्थागत दमन का रूप लेता नजर आ रहा है।
सरकारी पैसे के दुरुपयोग के आरोप
सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आ रहा है कि:
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इस केस को लंबा खींचने में भारी मात्रा में सरकारी धन खर्च किया गया
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और कथित तौर पर कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास भी हुए
अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल सेवा विवाद नहीं, बल्कि सिस्टम के दुरुपयोग का बड़ा उदाहरण बन सकता है।
अधिकारियों की चुप्पी पर उठे सवाल
सैनिक स्कूल जैसे संस्थान प्रशासन और रक्षा मंत्रालय के समन्वय से संचालित होते हैं। ऐसे में जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्टे के हाई कोर्ट के आदेश का पालन न करना सीधे तौर पर अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आ सकता है।
सिस्टम पर उठते बड़े सवाल
सैनिक स्कूल अंबिकापुर का यह मामला अब एक व्यक्ति की लड़ाई से आगे बढ़ चुका है। यह उस सवाल को सामने लाता है कि—
क्या कोई संस्था खुद को कानून से ऊपर समझ सकती है?
एक दशक की लंबी लड़ाई और अदालत के स्पष्ट आदेश के बाद भी अगर न्याय लागू नहीं होता, तो यह लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।
