अंबिकापुर: अगर आपसे ये पूछा जाए कि देश का सबसे खतरनाक दुश्मन कौन है? तो शायद आप कहेंगे कि सरहद पर बैठा कोई आतंकी… आपका ये जवाब सही तो है लेकिन पूरी तरह सही नहीं है। दरअसल किसी भी देश के लिए सरहद पर बैठा आतंकी अकेले ही सबसे बड़ा दुश्मन नहीं होता,देश के लिए उससे भी बड़े दुश्मन होते हैं वो कुर्सियों पर बैठे अफसर… जो जनता का खून चूसते हैं… दीमक की तरह, चुपचाप, भीतर से सिस्टम को खोखला कर देते हैं। ये अफसर सरहद पर बैठे किसी भी आतंकी से ज्यादा खतरनाक होते हैं। क्योंकि ये हमारे अपने सगे होते हैं ।
आज हम आपको ऐसे ही एक कुर्सी पर बैठे अफसर से परिचय करवाएंगे जिसका नाम करोड़ों के घोटाले का पर्याय बन चुका है। उसके विभाग में भी उसका नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है जानते हैं क्यों ? क्योंकि करोड़ों का घोटाला करने के बाद भी गिरफ्तारी तक नहीं हुई है साहब की,इतना ही नहीं अदालत ने भी अग्रिम जमानत देने से भी इनकार कर रखा है।
कुछ ऐसा ही जलवा है छत्तीसगढ़ स्टेट पवार लिमिटेड अंबिकापुर के तत्कालीन मुख्य अभियंता जो अब अधीक्षण अभियंता — राजेश लकड़ा का।
चलिए अब आपको बताते हैं कि राजेश लकड़ा ने ऐसा क्या कारनामा किया है जिसकी वजह से वो इतने चर्चित हो रहे हैं दअरसल यह पूरा मामला अंबिकापुर के चीफ इंजीनियर कार्यालय का है, जहां ठेकेदार मेसर्स आर.के. एसोसिएट्स, मैट्रिक्स सर्विस और गुरुकृपा ग्रुप ने मिलकर करोड़ों रुपए का गबन कर लिया। सभी ने मिलकर सुनियोजित तरीके से कर्मचारियों के वेतन से कटने वाले ईपीएफ, बोनस और ईएसआईसी की राशि को फर्जी बिलों से निकाला गया, लेकिन कर्मचारियों को एक पैसा नहीं मिला! जांच रिपोर्ट बताती है कि अगस्त 2020 से फरवरी 2022 तक सिर्फ 14 भृत्यों के मामले में 6 लाख 35 हजार से ज्यादा का भुगतान हुआ। 10 भृत्यों के लिए 14 लाख 50 हजार, और 150 कंप्यूटर ऑपरेटरों के लिए तो 1 करोड़ 62 लाख की लूट! कुल मिलाकर 1 करोड़ 82 लाख से ज्यादा का सरकारी नुकसान – और यह सब फर्जी चालानों, बदली हुई ईपीएफ रसीदों और बिना सत्यापन के बिल पास करने से हुआ।
जांच में साफ है कि चीफ इंजीनियर राजेश लकड़ा ने प्रभारी अधिकारी के तौर पर दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना बिल पास किए। ठेकेदारों के साथ मिलीभगत इतनी गहरी कि फर्जी ईपीएफ चालान लगाकर लाखों निकाले गए, और लकड़ा ने आंखें मूंद लीं। क्या यह सिर्फ लापरवाही है? नहीं, यह सुनियोजित साजिश है! कार्यपालन निदेशक की 24 फरवरी 2023 की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि लकड़ा जैसे अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखा, कर्मचारियों के हक को ठेकेदार प्रभोजत सिंह भल्ला जैसे लुटेरों के हवाले कर दिया। भल्ला की फर्मों ने उपस्थिति रजिस्टर तक फर्जी बनाए, और लकड़ा ने सब कुछ ‘ओके’ कर दिया। शर्म की बात है कि ऐसे अधिकारी सरकारी पद पर बैठकर जनता के पैसे को लूटते हैं, और फिर जमानत मांगते फिरते हैं!
लेकिन ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती है अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट डी०के० सोनी के हतक्षेप से मामला अदालत तक पहुंचा और 6 मई 2025 को विशेष अदालत ने साफ कहा — मामला गंभीर है। लिहाजा राजेश लकड़ा और प्रभोजत सिंह भल्ला की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई। लेकिन हद देखिए यदि ऐसे किसी मामले में कोई आम आदमी अगर हज़ार-दो हज़ार की धोखाधड़ी में फँस जाए तो पुलिस घर तोड़कर पकड़ लेती है। लेकिन यहाँ करोड़ों का खेल चल रहा है… और राजेश लकड़ा आज़ाद घूम रहा है।
क्या किसी ठेकेदार की औकात है कि वो अकेले इतना बड़ा खेल कर ले? बिल्कुल नहीं! इस पूरे घोटाले का किंगपिन वही अफसर है… वही मुख्य अभियंता… वही राजेश लकड़ा… जिसने अपनी कुर्सी और अपने पद को सोने की खान बना डाला। ये वही अफसर हैं जो जनता को बिजली बचाने के नारे देंगे… लेकिन खुद चोरी से भी बदतर हरकत करेंगे। ये वही अफसर हैं जो ईमानदारी की शपथ लेंगे… लेकिन रात के अंधेरे में सरकारी फाइलों पर फर्जीवाड़ा कर करोड़ों डकार जाएंगे। और पुलिस? सवालों के घेरे में है। आखिर क्यों कार्यवाही ठंडी पड़ी है? क्यों अब तक हथकड़ी नहीं लगी? क्या पुलिस भी किसी दबाव में है? या फिर कहीं न कहीं सांठगांठ की गंध है?
हमारे देश-समाज की असली बीमारी यही हैं — ये सफेदपोश चोर। ये डाकू नहीं… ये आतंकी नहीं… लेकिन इनसे भी ज्यादा खतरनाक हैं। क्योंकि आतंकी एक बार हमला करता है… ये रोज़ हमला करते हैं। आतंकी गोली चलाता है… ये जनता की जेब पर, भविष्य पर, सपनों पर वार करते हैं।
आज सवाल सिर्फ ये नहीं कि राजेश लकड़ा और प्रभोजत सिंह भल्ला कब जेल जाएंगे। असली सवाल ये है — कितने राजेश लकड़ा इस सिस्टम में बैठे हैं? कितने अधिकारी जनता के पैसों को अपनी तिजोरी में भर रहे हैं? और कब तक जनता चुप रहेगी? ये घोटाला सिर्फ एक केस नहीं… ये चेतावनी है। चेतावनी कि अगर ऐसे दीमक जैसे अफसरों को कुर्सियों से नहीं उखाड़ा गया… तो ये सिस्टम, ये समाज, ये देश अंदर से खोखला हो जाएगा। और फिर हमारे पास न ईमान बचेगा, न भरोसा… बस बचेगी तो सिर्फ लूट की कहानियाँ। तो राजेश लकड़ा सुन लीजिए — जनता की गाढ़ी कमाई खाने वालों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता। और ये जनता जब सवाल पूछना शुरू करती है… तो कुर्सी भी हिलती है और नींव भी।”
