अंबिकापुर। शहर की हृदयस्थली कहे जाने वाले इलाकों में सफेदपोश रसूखदारों ने सेवा के नाम पर ‘मौत की दुकानें’ सजा रखी हैं। नगर निगम अंबिकापुर का प्रशासन, जो आम आदमी के एक छोटे से अवैध छज्जे पर बुलडोजर चलाने की फुर्ती दिखाता है, वह गायत्री अस्पताल, लक्ष्मी नारायण अस्पताल और भजगावली अस्पताल जैसे बड़े मगरमच्छों के सामने ‘नतमस्तक’ और ‘लाचार’ नजर आता है। आयुक्त महोदय कागजों पर जांच का ढोंग तो बार-बार करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह ‘जांच’ केवल भ्रष्टाचार की फाइलों का वजन बढ़ाने और रसूखदारों को बचाने का एक जरिया बनकर रह गई है।
बनारस रोड स्थित गायत्री अस्पताल के विरुद्ध डॉ. डी.के. सोनी द्वारा की गई शिकायत के बाद नगर निगम ने बड़े जोर-शोर से ‘पांच सदस्यीय जांच कमेटी’ का गठन किया था। आदेश की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि प्रशासन ने “7 दिनों के भीतर रिपोर्ट” देने का दावा ठोक दिया था। आज उस बात को एक साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वह रिपोर्ट किस रद्दी की टोकरी में पड़ी है, यह बताने वाला कोई नहीं है। गायत्री अस्पताल ने भवन निर्माण अनुज्ञा (क्रमांक 7607) की धज्जियां उड़ाते हुए सेट-बैक और मार्जिनल डिस्टेंस की बलि चढ़ा दी है। सड़क की जमीन को निगलकर बनाया गया यह कंक्रीट का ढांचा आज पूरे शहर के लिए गले की हड्डी बन चुका है।
इन तथाकथित अस्पतालों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा तो देखिए; यहाँ इलाज के नाम पर मोटी रकम तो वसूली जाती है, लेकिन जब कोई मरीज अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे एक अदद सम्मानजनक जगह तक मयस्सर नहीं होती। गायत्री अस्पताल में मर्चुरी का अभाव इस कदर है कि अपनों को खोने वाले बिलखते परिजन शव को स्ट्रेचर पर ले कर मुख्य गेट या सीधे सड़क पर रखने को मजबूर होते हैं।
सड़क पर रखा वह शव और उसके पास बैठे परिजनों का चीख-पुकार और रुदन इस शहर की प्रशासनिक नपुंसकता का जीता-जागता सबूत है। महीने में दर्जनों बार होने वाले इस हृदयविदारक नजारे से आसपास के नागरिक और राहगीर मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, लेकिन निगम की कुंभकर्णी नींद नहीं टूट रही।
स्थानीय निवासियों का आक्रोश अब उबल रहा है। लोगों का कहना साफ है “इस अस्पताल से जितने मरीज चंगे होकर नहीं निकलते, उससे कहीं ज्यादा संख्या यहां से निकलने वाली लाशों की है।” बिना किसी मानक पैमाने के, बिना पार्किंग व्यवस्था के और बिना किसी तकनीकी मापदंड के इन ‘डेथ सेंटर्स’ का संचालन आखिर किसकी शह पर हो रहा है?
लक्ष्मी नारायण और भजगावली जैसे अस्पतालों पर भी कार्यवाही के नाम पर सिर्फ ‘गीदड़ भभकी’ दी जाती है। आयुक्त के पुराने बयानों और आज की जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। पार्किंग न होने के कारण इन अस्पतालों के बाहर एम्बुलेंस और निजी वाहनों का अंबार लगा रहता है, जिससे गंभीर मरीजों को लाने ले जाने वाली गाड़ियां भी जाम में फंसी रहती हैं।
अंबिकापुर की जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि इन रसूखदार ‘मौत के सौदागरों’ पर कड़ा प्रहार चाहती है। यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि शहर की व्यवस्था कानून से नहीं, बल्कि इन अस्पताल संचालकों की तिजोरियों से चलती है।
