एक कुर्सी… दो अफसर… और करोड़ों का खेल! धान खरीदी के नाम पर सरगुजा में सत्ता-सिस्टम की खौफनाक जंग
टोकन लेकर भटकते किसान, कुर्सी पर बैठे अफसर और सिस्टम के भीतर दबती एक मौत…
सरगुजा:छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर भाजपा सरकार के बड़े-बड़े दावे इस बार जमीनी हकीकत से टकराकर चूर-चूर हो गए। सरकार कहती रही कि किसानों के धान का एक-एक दाना खरीदा जाएगा, लेकिन सच्चाई यह है कि करीब तीन लाख किसान टोकन मिलने के बावजूद अपना धान नहीं बेच पाए। समितियों के बाहर किसान मायूस लौटते रहे और अंदर सहकारिता विभाग की कुर्सियों पर बैठी सत्ता आपस में ही उलझी रही।
धान खरीदी किसानों के लिए संकट बन गई और अधिकारियों के लिए कमाई का मौका।
एक ही कुर्सी, दो अधिकारी… आदेश भी दो!
सरगुजा जिले में सहकारिता विभाग इस समय पूरी तरह बेकाबू नजर आ रहा है। उप संचालक सहकारिता की कुर्सी किसी संवैधानिक पद से ज़्यादा करोड़ों की खान बन चुकी है। हैरानी की बात यह है कि शिल्पा अग्रवाल और सुरेश पैकरा—दोनों खुद को एक ही पद पर काबिज बताते हुए एक ही तारीख को समितियों को आदेश जारी कर रहे हैं।
सरगुजा जिले में सहकारिता विभाग इस समय पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नजर आ रहा है। उप संचालक सहकारिता की कुर्सी को लेकर ऐसा संघर्ष चल रहा है मानो यह कोई संवैधानिक पद नहीं, बल्कि करोड़ों की खान हो। एक तरफ शिल्पा अग्रवाल खुद को उसी पद पर काबिज मानते हुए आदेश जारी कर रही हैं, तो दूसरी तरफ सुरेश पैकरा उसी कुर्सी का मालिक होने का दावा करते हुए उसी तारीख को समितियों को निर्देश भेज रहे हैं जिस तारीख को शिल्पा अग्रवाल आदेश निकाल रही है। सवाल यह नहीं है कि दोनों में सही कौन है, सवाल यह है कि जब एक ही पद है तो दो अधिकारी एक साथ आदेश कैसे चला रहे हैं और जिला प्रशासन यह तमाशा कब से देख रहा है।
धान खरीदी के बीच यह कुर्सी का संघर्ष किसी भोले संयोग की तरह नहीं देखा जा सकता लेकिन विभाग के भीतर से उठ रही आवाजें और समितियों से आ रही सूचनाएं यह इशारा कर रही हैं कि धान खरीदी अब महज सरकारी प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि एक संगठित आर्थिक खेल बन चुकी है। जब एक-एक समिति प्रबंधक की कमाई को लेकर 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक की चर्चा खुलेआम हो रही हो, तो पूरे जिले के सहकारिता तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी संदर्भ में उप संचालक स्तर पर करोड़ों की कमाई करने की बातें सामने आ रही हैं, जिन पर न तो कोई स्पष्टीकरण दिया जा रहा है और न ही कोई खंडन।

इस पूरे मामले में सबसे डरावना और शर्मनाक अध्याय सीतापुर का है, जहां एक धान समिति प्रबंधक ने आत्महत्या कर ली। यह मौत आज भी संदेह के घेरे में है, लेकिन उससे ज़्यादा संदेहास्पद है प्रशासन की चुप्पी। महीनों बीत जाने के बाद भी न जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न यह बताया गया कि जांच किस स्तर पर है। जांच समिति के अध्यक्ष एसडीएम बताए जाते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया जो भी बयान दर्ज हुए वह क्या एसडीएम के सामने दर्ज हुए या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो रिपोर्ट सामने क्यों नहीं लाई जा रही। और अगर नहीं हुआ, तो जिम्मेदार कौन है।
यहां सबसे बड़ा और सबसे सीधा सवाल जिले के कलेक्टर से भी बनता है। क्या कलेक्टर को यह जानकारी नहीं है कि एक ही विभाग में एक ही कुर्सी को लेकर दो अधिकारी समान अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं। क्या उन्हें यह नहीं पता कि धान खरीदी के दौरान समितियों में भ्रम और अव्यवस्था का सीधा नुकसान किसानों को हो रहा है और अगर उन्हें सब पता है, तो अब तक कोई निर्णायक कार्यवाही क्यों नहीं हुई। क्या यह अनदेखी है या मौन स्वीकृति या फिर कलेक्टर साहब का भी हिस्सा निर्धारित किया जा चुका है?
आज हालात ऐसे हैं कि समिति प्रबंधक डर में हैं, किसान हताश हैं और अधिकारी आपस में कुर्सी खींचने में व्यस्त हैं। यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन का मामला बन चुका है। जब किसान अपनी फसल बेचने के लिए तरस रहा हो और विभाग के भीतर करोड़ों की चर्चाएं चल रही हों, तो यह मान लेना मुश्किल नहीं कि सिस्टम का मकसद सेवा नहीं, सुविधा बन चुका है।
यह ख़बर किसी एक अधिकारी के खिलाफ निजी हमला नहीं है, बल्कि उस पूरे तंत्र के खिलाफ सवाल है जो किसान के नाम पर चलता है और किसान को ही सबसे आख़िर में खड़ा करता है। शिल्पा अग्रवाल हों या सुरेश पैकरा, और इस पूरे घटनाक्रम पर मौन साधे कलेक्टर अब सवालों से बचने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। अगर अब भी जवाबदेही तय नहीं होती, तो यह मानना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़ में धान खरीदी नहीं, बल्कि धान के नाम पर सत्ता और पैसे की खुली लड़ाई चल रही है।
आज यह लड़ाई सिर्फ एक कुर्सी, एक अधिकारी या एक विभाग तक सीमित नहीं रह गई है। यह उस भरोसे की लड़ाई है जो किसान ने सरकार और सिस्टम पर किया था। धान खेत में उगा, पसीना किसान का बहा, उम्मीद सरकार से बंधी, लेकिन अंत में सब कुछ उन फाइलों और कुर्सियों के बीच फंस गया जिनका किसान से कोई लेना-देना नहीं। अगर इस पूरे घटनाक्रम पर अब भी जवाबदेही तय नहीं हुई, अगर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आदेश कौन जारी करेगा और जिम्मेदारी किसकी होगी, तो यह मान लेना होगा कि यह अव्यवस्था नहीं बल्कि स्वीकार की गई व्यवस्था है। और जिस दिन किसान यह मान लेगा कि सिस्टम उसके लिए नहीं है, उस दिन सिर्फ धान खरीदी नहीं रुकेगी, उस दिन लोकतंत्र की नींव में चुपचाप एक दरार पड़ जाएगी जिसे बाद में कोई आदेश, कोई जांच और कोई बयान भर नहीं पाएगा।
