छोटे शहरों में बड़ी कंपनियों का जाल: अंबिकापुर में ‘जेडी टोयोटा’ पर सवाल, फूड कंपनी के नाम पर चल रहा कार कारोबार

अंबिकापुर: देश के छोटे शहर अब बड़ी कंपनियों के लिए सिर्फ बाजार बन गए हैं।अंबिकापुर इसका ताज़ा उदाहरण है यहाँ कार कंपनियों के शोरूम तो खुल गए हैं, लेकिन सेवा का ढांचा अब भी अधूरा है।जेडी टोयोटा जैसी कंपनियां अंबिकापुर में गाड़ियाँ तो बेच रही हैं, लेकिन सर्विस सेंटर तक नहीं खोला। ग्राहक को सिर्फ यह बताया जाता है कि “हमारी सर्विस क्वालिटी बेस्ट है”, लेकिन जब गाड़ी में दिक्कत आती है, तो कहा जाता है “सर्विस सेंटर तो बिलासपुर में वहीं जाइए, क्योंकि वही हमारा हेड ऑफिस है।”
यानी गाड़ी अंबिकापुर में बेची गई, ग्राहक यहीं का, पैसा यहीं लिया गया, लेकिन जिम्मेदारी और जवाबदेही किसी और शहर में। यही नहीं, गाड़ी का बिल भी बिलासपुर के नाम पर जारी किया जा रहा है।ब्रांड की चमक, एयरकंडीशंड शोरूम और ऊंची-ऊंची बातें सुनकर ग्राहक भरोसा कर लेता है। लेकिन इस भरोसे के पीछे एक बड़ा जाल बिछा है ।यहाँ सवाल यह नहीं है कि सर्विस कहाँ मिलेगी, सवाल यह है कि कानूनी जिम्मेदारी कहाँ तय होगी।

इतना ही नहीं कंपनियां चतुराई से अपने कागज़ों में एक लाइन लिख देती हैं“किसी भी विवाद की स्थिति में न्याय क्षेत्र वही होगा जहाँ कंपनी का मुख्यालय स्थित है।”
यानी गाड़ी अंबिकापुर में बेची गई, पैसा यहीं दिया गया, ग्राहक यहीं का,लेकिन अगर धोखा हुआ या विवाद हुआ तो केस आपको बिलासपुर जाकर करना होगा।
यही वो कानूनी जाल, जिसमें ग्राहक फंस जाता है और कंपनी साफ निकल जाती है। कानूनी भाषा में इसे कहते हैं जुरिस्डिक्शन ट्रिक ,यानी “न्याय क्षेत्र का जाल।” कंपनियाँ जानबूझकर अपने कागज़ों में लिख देती हैं “सभी विवाद वहीं सुलझेंगे जहां हेड ऑफिस है।”और ग्राहक, ब्रांड के नाम पर भरोसा कर लेता है, बिना यह समझे कि उसने अपने ही हक़ का गला काटने वाला दस्तावेज़ साइन कर दिया है।

लेकिन कानून की नज़र से यह व्यवस्था न सिर्फ भ्रामक है बल्कि ग्राहक के अधिकारों के साथ खिलवाड़ भी है।कानून कहता है जहाँ लेन-देन हुआ, जहाँ सेवा दी गई, या जहाँ नुकसान हुआ वही अदालत, वही न्याय क्षेत्र है। लेकिन कंपनियाँ अनुबंध में लिखकर यह अधिकार छीन लेती हैं। क्यों?क्योंकि उन्हें पता है छोटे शहर का ग्राहक अदालत नहीं जाएगा,वो चुपचाप नुकसान झेलेगा और फिर से वही गलती दोहराएगा।अगर किसी ब्रांड का बोर्ड आपके शहर में लगा है तो उसे सेवा भी आपके शहर में देनी होगी,जवाबदेही भी यहीं तय करनी होगी।कानून का दांव लगाकर जिम्मेदारी से भागना,सिर्फ ग्राहक नहीं, कानून की आत्मा के साथ धोखा है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत कोई भी उपभोक्ता वहीं शिकायत कर सकता है जहाँ उसने सामान खरीदा, सेवा प्राप्त की या नुकसान झेला।
इसलिए कंपनी का यह कहना कि मामला सिर्फ हेड ऑफिस के क्षेत्र में ही चलेगा, कानूनी रूप से टिकता नहीं।पर ग्राहक को यह बात कौन बताता है? वह तो ब्रांड के नाम पर भरोसा कर लेता है और एक साइन से अपनी लड़ाई खुद मुश्किल बना देता है।ऐसा नहीं है कि ग्राहकों के साथ इस तरह का गैरकानूनी खेल केवल जेडी टोयोटा के द्वारा खेला जा रहा है बल्कि शहर में खुले तमाम फॉर व्हिलर गाड़ियों के शोरूम की थी कहानी है फिर चाहे वो NISSAN हो जेडी टोयोटा हो या फिर मॉरिस गैराज जिसे हम आसान भाषा में एम. जी. भी बोलते हैं यह सब इस खेल में महारत हासिल किए हुए बाजार से गिद्ध हैं जो ग्राहकों को नोचने के लिए शहर में आ बैठे हैं। अंबिकापुर में इनका बड़ा शो-रूम है, सेल्स टीम है, गाड़ियाँ बिक रही हैं, लेकिन सर्विस के नाम पर कंपनी हाथ खड़े कर देती है।

दरअसल हमें भी इन चमचमाते शोरूम के पीछे का यह राज मालूम भी नहीं था,लेकिन जेडी टोयोटा में गाड़ी खरीदने गए के ग्राहक ने हमसे संपर्क कर अपने साथ हुई घटना कि जानकारी दी तब इस गोरख धंधे का सच सामने आया। जिन्हें में हमे जानकारी दी हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं साथ उनकी जागरूकता को सलाम भी करते हैं ग्राहक अगर किसी शिकायत के लिए जाता है तो जवाब मिलता है “सर, यह हमारे बिलासपुर ऑफिस के अधीन आता है।” यानि अंबिकापुर ,कोरबा ,रायगढ़, सूरजपुर जैसे जिलों में कारोबार, लेकिन जवाबदेही बिलासपुर की।

क्या यही है “कस्टमर केयर” का नया चेहरा?

कानून साफ कहता है कि जहाँ सौदा हुआ वही न्याय क्षेत्र बनेगा,पर कंपनियां इस प्रावधान को कागज़ी चालाकी से दबा देती हैं।
उपभोक्ता को लगता है कि यह सामान्य औपचारिकता है,लेकिन यही एक लाइन बाद में उसके हक़ के दरवाज़े बंद कर देती है।

अब सवाल उठता है क्या प्रशासन को यह नहीं दिख रहा कि उपभोक्ता किस तरह कानूनी शब्दजाल में फंस रहा है?
क्या सिर्फ बड़े नाम और चमकदार ब्रांड बोर्ड देखकर हम सब अपनी जवाबदेही की मांग छोड़ देंगे?

हमारे जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि कई बड़े शहर में जेडी टोयोटा के नाम से जो शोरूम है उसका व्यापारिक पंजीयन *प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड* के नाम से है और जीएसटी पंजीयन भी इसी नाम से है, लेकिन इन सभी शहरों के शोरूम से जो बिल कोटेशन आदि दिए जाते हैं उनमें प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बड़े अक्षरों में लिखा होता है लेकिन एड्रेस उन्ही शहरों का ही रहता है जिससे ग्राहक यह समझ ही नहीं पाता है कि वह जिस डीलर से गाड़ी खरीद रहा है कहां का,अपने ही शहर का है या कोई परदेशी है?

कानून कायदों और ग्राहकों के साथ कैसे भद्दा मजाक किया जा रहा है कि उसी पंजीयन के तहत उसने अंबिकापुर में शोरूम और बिक्री संचालन शुरू कर रखा है। यानी गाड़ियों का कारोबार किसी ऑटोमोबाइल कंपनी के नाम से नहीं, बल्कि एक फूड प्रोडक्ट्स कंपनी के जीएसटी पंजीयन से किया जा रहा है।

यह बात अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या एक फूड प्रोडक्ट्स के लाइसेंस से वाहन बिक्री का कारोबार किया जा सकता है?
अब इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जेडी टोयोटा और प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड असल में एक ही संस्था हैं।

गाड़ियों की बिक्री जेडी टोयोटा” नाम से की जा रही है, लेकिन पूरा व्यवसायिक पंजीयन यानी जीएसटी और कंपनी रजिस्ट्रेशन “प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड” के नाम पर है।अब सवाल यह है कि जब पंजीयन किसी “फूड प्रोडक्ट्स” कंपनी का है, तो उसी पंजीयन से ऑटोमोबाइल बिक्री जैसे अलग व्यापार को कैसे चलाया जा सकता है?
कानून के अनुसार, जीएसटी पंजीयन किसी विशेष प्रकृति के व्यवसाय के लिए होता है।

अगर कंपनी उसी पंजीकरण से किसी दूसरे तरह के व्यवसाय जैसे खाद्य पदार्थों से हटकर वाहन बिक्री में उतरती है, तो यह नियम 18 और CGST Act की धारा 122 का उल्लंघन माना जाएगा।
इतना ही नहीं जेडी टोयोटा यानी प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स का जीएसटी पंजीकरण बिलासपुर में है, लेकिन उसी पंजीकरण के आधार पर अंबिकापुर में शोरूम खोला गया है।

वैसे यहां आपको हम यह भी स्पष्ट कर दें कि तकनीकी रूप से यह संभव है लेकिन इस बारे में भी कानून साफ कहता है कि अगर कोई कंपनी एक ही राज्य में कई जगहों से कारोबार करती है, तो उसे उन सभी स्थानों को अपने जीएसटी पोर्टल पर अतिरिक्त व्यवसायिक स्थान के रूप में दर्ज करना अनिवार्य है।

अगर यह दर्ज नहीं किया गया, तो यह अवैध व्यापारिक गतिविधि मानी जाएगी क्योंकि ऐसी स्थिति में कंपनी न तो स्थानीय कर अधिकारियों को सही जानकारी दे रही है, न ही उपभोक्ताओं को वास्तविक व्यवसायिक पहचान।

अर्थात्, यह मामला सिर्फ सर्विस सेंटर की कमी या बिक्री की चालबाज़ी का नहीं, बल्कि एक ऐसे कानूनी विरोधाभास का उदाहरण है जहाँ एक “फूड कंपनी” कागज़ों पर वैध दिखते हुए भी वाहन बिक्री कर रही है और ग्राहक, जिसे भरोसा था कि वह “जेडी टोयोटा” से गाड़ी खरीद रहा है, असल में सौदा कर रहा है एक “प्रसाद फूड प्रोडक्ट्स प्रा. लि.” नाम की कंपनी से जिसका कारोबार, पंजीयन, और कानूनी जिम्मेदारी सब किसी और शहर और किसी और प्रकृति के व्यवसाय से जुड़ा है।

प्रशासन, उपभोक्ता फोरम और कर विभाग इस पूरे खेल को सिर्फ व्यापारिक मामला मानकर न टालें। क्योंकि यहाँ सवाल सिर्फ गाड़ियों के सर्विस सेंटर का नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों, कर पारदर्शिता और कानून के सम्मान का है।

अगर कंपनियाँ अंबिकापुर जैसे छोटे शहरों में कारोबार करती हैं, तो उन्हें यह याद रखना होगा छोटे शहरों के ग्राहक अब छोटे नहीं रहे। अब वे सिर्फ गाड़ी नहीं खरीदते, वे जवाबदेही भी खरीदते हैं और जब जवाबदेही बिकना बंद हो जाएगी, तब शायद कंपनियों को भी एहसास होगा कि भारत के बाजार में अब भरोसा सबसे कीमती चीज़ है और इसे खो देने की कीमत किसी भी ब्रांड के लिए बहुत भारी पड़ सकती है।