बिहार मूल के व्यक्ति पर वन अधिकार पट्टा हासिल करने का आरोप, 75 साल निवास की शर्त पूरी किए बिना जमीन कब्जाने की शिकायत
अम्बिकापुर। सरगुजा संभाग में वन अधिकार पट्टा को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के ग्राम ओरंगा निवासी पण्डो विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) परिवार ने कमिश्नर सरगुजा संभाग से शिकायत कर आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी काबिज भूमि पर कथित रूप से नियमों को दरकिनार कर एक गैर-आदिवासी व्यक्ति के नाम वन अधिकार पट्टा जारी कर दिया गया। पीड़ित परिवार ने पट्टा निरस्त करने, एफआईआर दर्ज करने और मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
पुश्तैनी जमीन पर अवैध पट्टा का आरोप
ग्राम ओरंगा निवासी भुलन पण्डो और मंती पण्डो ने कमिश्नर को सौंपे आवेदन में बताया है कि ग्राम की भईसबोरवा नदी के पास स्थित खसरा नंबर 413, रकबा 0.16 हेक्टेयर भूमि उनके पूर्वजों की खुटा काटा पुश्तैनी काबिज काश्त भूमि है। उनका आरोप है कि बिहार के गया जिले के मूल निवासी सुल्तान मियां ने वर्ष 2007-08 में पटवारी से कथित मिलीभगत कर उक्त भूमि पर अपने नाम वन अधिकार पट्टा क्रमांक 0002448 प्राप्त कर लिया।
वर्ष 2000 में भी हुई थी शिकायत
आवेदन में उल्लेख किया गया है कि भूमि विवाद नया नहीं है। पीड़ित परिवार का कहना है कि 2 अगस्त 2000 को ही तहसीलदार रामानुजगंज और थाना रामचंद्रपुर में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनकी जमीन पर कब्जे की कोशिश की जा रही है। इसके बावजूद बाद के वर्षों में वन अधिकार पट्टा जारी कर दिया गया।
कानून के उल्लंघन का आरोप
शिकायतकर्ताओं ने वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 2(o) का हवाला देते हुए दावा किया है कि अन्य पारंपरिक वन निवासी (OTFD) श्रेणी में वन अधिकार पट्टा प्राप्त करने के लिए 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम 75 वर्षों के निवास और कब्जे का प्रमाण आवश्यक है।
आवेदन के अनुसार, सुल्तान मियां का परिवार कुछ वर्षों पूर्व ही ग्राम ओरंगा में आकर बसा था और वर्ष 2007-08 में उनकी आयु लगभग 30 से 35 वर्ष थी। ऐसे में 75 वर्ष की अनिवार्य अवधि पूरी नहीं होने के बावजूद पट्टा जारी किया जाना नियमों के विपरीत बताया गया है।
धमकी देकर कब्जा करने का आरोप
पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि पूर्व में विवाद की शिकायत मिलने पर तत्कालीन थाना प्रभारी ने गांव पहुंचकर स्थल निरीक्षण किया था। उस दौरान ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भूमि पर पण्डो परिवार के लंबे समय से कब्जे की पुष्टि की थी। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कुछ समय के लिए उन्हें कब्जा वापस मिला, लेकिन बाद में कथित रूप से धमकी और दबाव बनाकर दोबारा जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
ग्राम सभा को गुमराह करने का दावा
आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि वन अधिकार पट्टा प्राप्त करने के लिए ग्राम सभा को भ्रामक जानकारी दी गई तथा पण्डो समुदाय के लोगों को डरा-धमकाकर कथित रूप से प्रस्ताव पारित कराया गया।
2020 से 2023 तक जारी रहा विवाद
शिकायतकर्ताओं के अनुसार भूमि को लेकर विवाद लगातार बना हुआ है। वर्ष 2020 और 2023 में भी भूमि पर जोताई और क्यारी निर्माण को लेकर विवाद हुआ था। ग्राम पंचायत स्तर पर बैठकें आयोजित की गईं और दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने की सलाह दी गई, लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ।
बताया गया है कि 5 जून 2026 को भी ग्राम पंचायत में मामले के समाधान के लिए बैठक प्रस्तावित थी, लेकिन आरोपित पक्ष उपस्थित नहीं हुआ।
पीड़ित परिवार ने क्या कहा?
भुलन पण्डो का आरोप है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवार से हैं, जबकि दूसरा पक्ष प्रभावशाली और संपन्न है। उनका कहना है कि वे पिछले 24 वर्षों से अपनी पुश्तैनी भूमि के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब न्याय की उम्मीद में प्रशासन के समक्ष पहुंचे हैं।
प्रशासन से ये मांगे
शिकायतकर्ताओं ने कमिश्नर से मांग की है कि—
* खसरा नंबर 413, रकबा 0.16 हेक्टेयर पर जारी वन अधिकार पट्टा क्रमांक 0002448 को निरस्त किया जाए।
* कथित फर्जीवाड़े, जमीन कब्जाने और धमकी देने के आरोपों की जांच कर एफआईआर दर्ज की जाए।
* वास्तविक हकदारों के नाम पर वन अधिकार पट्टा जारी कर भूमि का कब्जा दिलाया जाए।
* मामले में कथित रूप से संलिप्त राजस्व अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
फिलहाल मामले में प्रशासनिक स्तर पर जांच और कार्रवाई को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। शिकायत के बाद अब निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
