अंबिकापुर में जनजातीय गौरव दिवस पर पण्डो समाज के लिए गर्व का क्षण
अंबिकापुर। जनजातीय गौरव दिवस 2025 के राज्य स्तरीय कार्यक्रम में गुरुवार को एक भावुक और ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पण्डो जनजाति के वरिष्ठ सदस्य बसन्त पण्डो से विशेष मुलाकात की। कार्यक्रम स्थल पर राष्ट्रपति ने बसन्त पण्डो का कुशल-क्षेम पूछा, उन्हें पास बुलाया और स्नेहपूर्वक शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
राष्ट्रपति मुर्मु ने बसन्त पण्डो से कहा – “आप मेरे भी पुत्र हैं।” यह वाक्य सुनकर पूरा सभामंडप तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बसन्त पण्डो भावुक दिखाई दिए और कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित जनजातीय समाज के लोगों के चेहरे पर गर्व झलक उठा।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद से जुड़ी ऐतिहासिक यादें
बसन्त पण्डो और राष्ट्रपति के बीच यह रिश्ता कोई नया नहीं है। यह 73 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। वर्ष 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अंबिकापुर प्रवास पर आए थे। उस समय 8 वर्षीय बालक गोलू (आज के बसन्त पण्डो) कार्यक्रम में मौजूद थे। बालक की मासूमियत और सादगी देखकर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद प्रभावित हुए और उन्होंने उसे गोद में उठाकर नाम बदलकर “बसन्त” रखा। इस प्रतीकात्मक रूप से उन्हें अपना दत्तक पुत्र मान लिया। इसके बाद से पण्डो जनजाति को देश में “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” के रूप में सम्मानित किया गया।
पण्डो समाज के लिए गौरव का क्षण
राष्ट्रपति मुर्मु की यह स्नेहपूर्ण मुलाकात पण्डो समाज के लिए गर्व और स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। जनजातीय नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों ने इसे ऐतिहासिक बताया। इस अवसर पर बसन्त पण्डो ने राष्ट्रपति से पांच प्रमुख मांगें लिखित रूप में रखीं:
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पण्डो जनजाति के लोगों को केंद्रीय सूची में शामिल करना ताकि सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
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पण्डो जनजाति को भूमि का पट्टा जारी करना।
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पण्डो जनजाति के शिक्षित बेरोजगारों को नौकरी का लाभ।
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छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में पण्डो जनजाति के निवासस्थानों में आवासीय शिक्षा प्रदान करना।
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पण्डो जनजाति निवासरत सभी जिलों में अस्पताल की सुविधा उपलब्ध कराना।
बसन्त पण्डो का संदेश
लगभग 80 वर्ष के बसन्त पण्डो आज भी सरल और सादगीपूर्ण जीवन जी रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात को “जीवन का सबसे बड़ा सम्मान” बताया और कहा कि यही अपनापन उन्हें 1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मिला था।
कार्यक्रम के दौरान मंच और सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह क्षण न केवल अंबिकापुर, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज के लिए गर्व और सम्मान का प्रतीक बन गया।
