रायपुर। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच में देरी को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूछा कि ऐसी कौन-सी जांच बची है जो अब तक पूरी नहीं की जा सकी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और सवाल
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कोर्ट ने कहा, “एक तरफ कहते हो कि आरोपियों को बेल नहीं देनी है, दूसरी तरफ कहते हो कि हम जांच कर रहे हैं। तो ऐसी कौन-सी जांच है जो अभी चल रही है?”
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ED को निर्देश दिया गया कि जांच अधिकारी अपना पर्सनल एफिडेविड दाखिल करें, जिसमें स्पष्ट किया जाए कि पूर्व मंत्री कवासी लखमा के खिलाफ कौन-सी जांच चल रही है और इसे पूरा करने के लिए कितना समय चाहिए।
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मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को होगी।
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ED ने लखमा को 15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने आबकारी अधिकारियों को दी स्थायी सुरक्षा
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कोर्ट ने आबकारी विभाग के अधिकारियों को पहले दी गई अंतरिम गिरफ्तारी सुरक्षा को स्थायी कर दिया।
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यह आदेश मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों वाले मामलों की सुनवाई के दौरान दिया गया।
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जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाया।
ED के आरोप
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ED का दावा है कि पूर्व मंत्री और मौजूदा विधायक कवासी लखमा शराब सिंडिकेट का अहम हिस्सा थे।
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लखमा के निर्देश पर ही सिंडिकेट काम करता था और उन्हें शराब नीति बदलने में मदद मिलती थी, जिससे छत्तीसगढ़ में FL-10 लाइसेंस की शुरुआत हुई।
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ED का आरोप है कि लखमा को आबकारी विभाग में हो रही गड़बड़ियों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने उसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी इस बात की ओर इशारा करती है कि जांच में लगातार देरी बरतने पर उच्चतम न्यायालय सख्त रुख अपना सकता है।
