राज्योत्सव 2025: रजत जयंती का उत्सव बन गया विवादों और नाराजगी का मंच

रायपुर, 6 नवंबर 2025: छत्तीसगढ़ के रजत जयंती राज्योत्सव 2025 का समापन विवादों और आलोचनाओं के बीच हुआ। कुल मिलाकर आयोजन का स्वरूप आम जनता के उत्सव से ज्यादा सत्ता-स्तर के ठसके और मंचीय शो तक सीमित रहा, जबकि कई जिलों से ऐसी तस्वीरें और घटनाएँ सोशल मीडिया पर वायरल रहीं जिन्होंने आयोजन की मर्यादा और संवेदना पर प्रश्न खड़े कर दिए।

मुख्य बातें — एक नज़र

  • बेमेतरा: कलेक्टर-पार्षद विवाद — मंच के सामने बैठे पार्षदों को पीछे बैठने के लिए कहा गया, जिसके बाद पार्षदों और प्रशासन के बीच तत्क्षण हंगामा हुआ। मामला देर रात तक गरमा गया और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चले। विपक्ष ने इसे अधिकारियों का कठोर रवैया बताया।

  • सरगुजा: कृषि मंत्री द्वारा सम्मान के नाम पर मंच पर बुलाए गए रक्तदाता के साथ की गई मजाकिया टिप्पणी के बाद वह सम्मान पत्र लौटा कर चले गए; घटना ने संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए।

  • कोरबा: नेताओं-मंत्रियों के कट-आउट्स का परिवहन पशु-ट्रॉली/पशुगाड़ी में करने का वीडियो वायरल हुआ — महापौर के निर्देश पर आयुक्त ने कर्मचारियों को नोटिस जारी किया।

  • राजनांदगांव: ‘लखपति दिदियों’ को कार्यक्रम स्थल पर लाने के लिए कचरा उठाने वाली गाड़ी का उपयोग किए जाने की वारदात — जो आई हुई और बैठाई गई महिलाएँ थीं, उन्हें अपमानजनक परिस्थितियों में ले जाया जाना भी चर्चा में रहा।

  • कवर्धा और सूरजपुर: कवर्धा में भाजपा कार्यकर्ता-पुलिस के बीच हंगामा; सूरजपुर में स्थानीय विधायक ने मंच से राज्य गठन का गलत वर्ष बोल दिया, जो ध्यान खींचने वाला मोमेंट बन गया।

  • राष्ट्रीय स्तर से जुड़ा वाकया: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने प्रधानमंत्री को मंच पर गलती से “मुख्यमंत्री” कह दिया; वीडियो वायरल हुआ और सोशल मीडिया में मज़ाक-टिप्पणी हुई।

  • बिलासपुर/कोरबा हादसा-संदर्भ: 4 नवंबर को कोरबा-बिलासपुर रूट पर MEMU ट्रेन और मालगाड़ी की टक्कर में करीब 11 लोगों की मौत की खबर के बीच, उसी दिन राज्योत्सव-समापन में राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा का मंच पर गाना सोशल मीडिया और विपक्ष की तीखी आलोचना का कारण बना — विपक्ष ने इसे असंवेदनशीलता बताया।

  • मंत्री-प्रतिभागिता: कई जिलों में स्थानीय राजनीतिक हैसियत रखने वाले कुछ मंत्रियों के गैर-संगत व्यवहार और कार्यक्रमों की प्राथमिकता न देने की बातें भी उठीं — कुछ जगह मंत्री कार्यक्रमों में देर से आएं या अनुपस्थित रहे।

    https://youtu.be/29enK8AACB8

राज्यव्यापी तस्वीर: आयोजक बनाम वास्तविकता
उपस्थित रिपोर्टों और वायरल वीडियो से साफ झलकता है कि राज्योत्सव का आयोजन औपचारिकता और दिखावे तक सीमित रहा — विशेषकर उन स्टॉलों/प्रदर्शनों का जो सिर्फ ‘डेमो’ के रूप में आकर्षक दिखते थे, पर वास्तविक मायने में जनता या ग्रामीण उद्यमियों से जुड़ाव न के बराबर था। कई जिलों में दर्शकों की कुर्सियाँ खाली पाईं गईं और आयोजन प्रबंधन में जिम्मेदार अधिकारियों पर ‘बासी तरीके से काम निपटाने’ का आरोप लगा। कुछ स्थानों पर आयोजन का केंद्र बनाम आम-जन की उपस्थिति में बड़ा फासला दिखा — यही कारण रहा कि कई स्थानों पर भाजपा के अपने कार्यकर्ता भी दूरी बनाए दिखे, जिससे आयोजन-स्थलों की सुनसान तस्वीर और बढ़ गई।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
विपक्षी दलों ने कई घटनाओं — रक्तदाता का अपमान, ट्रेन हादसे के दिन मंत्री का मंचीय गाना, और अन्य अपमानजनक व्यवस्थाओं — पर तीखी आलोचना की। कांग्रेस ने विशेष रूप से कहा कि राज्योत्सव जनता के लिये है, सत्ता-प्रमुखों के लिए नहीं, और कुछ घटनाओं को सरकार की संवेदनहीनता करार दिया। वहीं अधिकारियों और कई आयोजन-प्रबंधकों की अनदेखी और लापरवाही के आरोप उठे हैं। प्रशासन के कुछ हिस्सों ने कोरबा के कट-आउट परिवहन मामले में नोटिस जारी कर कार्रवाई का संकेत दिया, पर अन्य कई मामलों में कोई स्पष्ट कार्यवाही नहीं दिखाई दी।

विशेष टिप्पणी — संवेदना और प्राथमिकता का अभाव
आयोजन के दौरान उत्पन्न कई घटनाएँ यह सवाल उठाती हैं कि जब किसी जिले में बड़ी मानवीय त्रासदी होती है तो उस समय आयोजनों की टोन और उपस्थित गणमान्यों का व्यवहार किस प्रकार संवेदनशील होना चाहिए। ट्रेन हादसे जैसी घटनाओं के समय मंच पर हँसी-ठिठोली या गीत-संगीत को कई लोगों ने अनुचित और असंवेदनशील करार दिया। यह भावना जनता और सोशल मीडिया दोनों में काफी तेज़ी से व्यक्त हुई।

राज्योत्सव 2025 के समापन ने उत्सव की चमक के पीछे की कई खामियों और व्यवहारगत विसंगतियों को उजागर किया। आयोजनों का स्वरूप, अधिकारियों तथा नेताओं के व्यवहार और आम लोगों की उपस्थिति-अभाव ने यह संदेश दिया कि इस बार राज्योत्सव व्यापक जनभागीदारी का उत्सव बनने में नाकाम रहा और कई जगह आयोजन का केंद्र केवल मंचीय शो और सत्ता-प्रदर्शन बनकर रह गया। भविष्य में यदि राज्योत्सव को एक वास्तविक जन-उत्सव बनाए रखना है, तो आयोजकों, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के लिए संवेदनशीलता, पारदर्शिता और आम जनता के समावेश पर गंभीर विचार करने की जरूरत निश्चय ही है।