अम्बिकापुर। सरगुजा संभाग में विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) पण्डो परिवारों की पुश्तैनी जमीन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के ग्राम ओरंगा के कई पण्डो परिवारों ने कमिश्नर, आईजी, कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार को शिकायत सौंपकर आरोप लगाया है कि झारखंड मूल के तीन भाइयों ने कथित रूप से राजस्व कर्मचारियों से मिलीभगत कर उनकी पुश्तैनी और सिंहदेव प्रकरण की व्यवस्थापन भूमि पर अवैध पट्टे बनवा लिए हैं।
पीड़ित परिवारों ने अवैध पट्टे निरस्त करने, भूमि वापस दिलाने और संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
62 वर्षों से कब्जे का दावा
आवेदन के अनुसार ग्राम ओरंगा स्थित पुराना खसरा नंबर 219/3 (नया खसरा नंबर 387, रकबा 1.29 हेक्टेयर) और पुराना खसरा नंबर 219/4 (नया खसरा नंबर 389, रकबा 0.68 हेक्टेयर) पण्डो परिवारों की पुश्तैनी काबिज काश्त भूमि है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह भूमि उनके पूर्वज देवसाय पण्डो के कब्जे में रही है और वर्ष 1975-76 के सिंहदेव प्रकरण की व्यवस्थापन सूची में भी इसका उल्लेख मिलता है। परिवारों का दावा है कि वे पिछले लगभग 62 वर्षों से इन जमीनों पर काबिज हैं।
फर्जी पट्टा बनवाने का आरोप
पीड़ितों का आरोप है कि झारखंड के ग्राम चेचेरिया निवासी दिवाकर तिवारी, महेंद्र तिवारी और प्रभाकर तिवारी ने कथित रूप से पटवारी से मिलीभगत कर जमीन के अभिलेखों में हेरफेर कर अपने नाम पट्टे बनवा लिए।
आवेदन में दावा किया गया है कि खसरा नंबर 387 पर दिवाकर तिवारी के नाम और खसरा नंबर 389 पर महेंद्र तिवारी के नाम कथित रूप से नियम विरुद्ध पट्टे जारी किए गए, जबकि इन जमीनों पर उनका कभी वास्तविक कब्जा नहीं रहा।
वन अधिकार कानून के उल्लंघन का आरोप
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत अन्य परंपरागत वन निवासी (OTFD) श्रेणी में पट्टा प्राप्त करने के लिए 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम 75 वर्षों के निवास और वन भूमि पर निर्भरता का प्रमाण आवश्यक है।
आवेदन में कहा गया है कि संबंधित परिवार वर्ष 1970 के बाद ग्राम ओरंगा में आकर बसे थे, इसलिए वे वन अधिकार पट्टा पाने की पात्रता पूरी नहीं करते थे। इसके बावजूद कथित रूप से उनके नाम पट्टे जारी कर दिए गए।
कई दस्तावेज होने का दावा
पण्डो परिवारों ने दावा किया है कि उनके पास 1964 के काश्त संबंधी दस्तावेज, 1968 का कब्जा जांच प्रतिवेदन, 1973 का शपथपत्र, सिंहदेव प्रकरण की सूची, नजराना पावती, नक्शा और राजस्व अभिलेख सहित कई दस्तावेज मौजूद हैं, जो उनके कब्जे और दावे को प्रमाणित करते हैं।
8 खसरा नंबरों में हेराफेरी का आरोप
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि बंदोबस्त के दौरान कई खसरा नंबरों में त्रुटियां और हेराफेरी की गई। पण्डो परिवारों का दावा है कि इस कथित गड़बड़ी के कारण कई परिवारों की वास्तविक जमीनें दूसरे लोगों के नाम दर्ज हो गईं और कई जगहों पर जमीनों की अदला-बदली कर दी गई।
धारा 170-ख के तहत कार्रवाई की मांग
पीड़ित परिवारों ने प्रशासन से मांग की है कि अनुसूचित जनजाति की जमीनों के कथित अवैध हस्तांतरण की जांच कर छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-ख के तहत कार्रवाई की जाए।
इसके साथ ही उन्होंने सभी विवादित पट्टों को निरस्त करने, वास्तविक काबिज परिवारों के नाम पट्टा जारी करने, भूमि का भौतिक कब्जा दिलाने तथा कथित रूप से संलिप्त व्यक्तियों और संबंधित राजस्व कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
प्रशासनिक जांच की मांग तेज
मामले को लेकर पण्डो परिवारों ने विशेष सर्वे और बंदोबस्त जांच टीम गठित कर पूरे ग्राम ओरंगा के भूमि अभिलेखों की सूक्ष्म जांच कराने की मांग की है। उनका आरोप है कि वर्षों से चली आ रही गड़बड़ियों के कारण कई आदिवासी परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन से वंचित हो गए हैं।
फिलहाल इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। शिकायत मिलने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसियां और राजस्व विभाग इस गंभीर आरोपों वाले मामले में क्या कार्रवाई करते हैं।
