बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एकतरफा तलाक की डिक्री से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने माना कि पत्नी को समुचित तरीके से नोटिस की तामील कराए बिना उसके खिलाफ एकतरफा तलाक की डिक्री पारित करना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना उसके खिलाफ आदेश पारित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अखबार में नोटिस प्रकाशित करना समन की तामील का अंतिम उपाय है। इससे पहले सामान्य तरीके से नोटिस देने और आवश्यक होने पर संबंधित व्यक्ति के घर पर नोटिस चस्पा करने जैसी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
मामले में हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 23 जून 2025 के आदेश को रद्द करते हुए प्रकरण को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया है। अब फैमिली कोर्ट पत्नी की ओर से एकतरफा तलाक की डिक्री रद्द करने के लिए दायर आवेदन पर दोबारा सुनवाई करेगा। दोनों पक्षों को 12 अक्टूबर को फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
पति ने जनवरी 2024 में दाखिल किया था तलाक का केस
मामला सूरजपुर निवासी एक महिला से जुड़ा है। उसके पति ने 9 जनवरी 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के दिए गए पते पर पंजीकृत डाक के माध्यम से नोटिस भेजा।
हालांकि, नोटिस सही पते पर नहीं होने के कारण वापस लौट आया। इसके बाद पति की ओर से अखबार में नोटिस प्रकाशित कराने की मांग की गई। फैमिली कोर्ट ने इस मांग को मंजूर करते हुए 29 फरवरी 2024 को स्थानीय अखबार में नोटिस प्रकाशित करा दिया।
इसके बाद पत्नी के अदालत में उपस्थित नहीं होने पर फैमिली कोर्ट ने 25 अप्रैल 2024 को एकतरफा तलाक की डिक्री पारित कर दी।
हाई कोर्ट ने नोटिस की प्रक्रिया पर उठाया सवाल
मामला हाई कोर्ट पहुंचने पर डिवीजन बेंच ने सिविल प्रक्रिया संहिता यानी CPC के आदेश 5 के नियम 17 और 20 का हवाला देते हुए नोटिस की तामील की प्रक्रिया पर गौर किया।
हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने केवल एक बार नोटिस वापस आने के बाद सीधे अखबार में नोटिस प्रकाशित करने का आदेश दे दिया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रयास दिखाई नहीं देता कि पत्नी के घर पर नोटिस चस्पा कराया गया हो या नोटिस की तामील के लिए अन्य निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई हो।
कोर्ट ने कहा कि केवल नोटिस वापस आने के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं था कि पत्नी जानबूझकर नोटिस लेने से बच रही थी। रिकॉर्ड में ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त आधार भी नहीं था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अखबार में नोटिस प्रकाशित करना समन की तामील का अंतिम उपाय है और उससे पहले सामान्य कानूनी प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
पत्नी ने कहा, तलाक की कार्यवाही की जानकारी ही नहीं थी
महिला का कहना था कि उसे तलाक की कार्यवाही के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसके अनुसार, 18 नवंबर 2024 को औरंगाबाद में चल रहे भरण-पोषण से जुड़े मामले की काउंसलिंग के दौरान उसे पहली बार पता चला कि उसके खिलाफ एकतरफा तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है।
इसके बाद उसने तलाक की डिक्री की प्रमाणित प्रति हासिल की और 2 दिसंबर 2024 को फैमिली कोर्ट में एकतरफा तलाक की डिक्री को रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया।
महिला की ओर से देरी को माफ करने की भी मांग की गई थी। हाई कोर्ट ने उसकी अर्जी स्वीकार करते हुए एकतरफा तलाक की डिक्री को चुनौती देने में हुई देरी को माफ कर दिया।
अब फैमिली कोर्ट में फिर होगी सुनवाई
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 23 जून 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया है। अब फैमिली कोर्ट पत्नी की ओर से एकतरफा तलाक की डिक्री रद्द करने के लिए दायर आवेदन पर कानून के अनुसार दोबारा सुनवाई करेगा।
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को 12 अक्टूबर को फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इस फैसले के साथ कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उसे उचित नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है। साथ ही, अखबार में नोटिस प्रकाशित करने जैसी प्रक्रिया तभी अपनाई जानी चाहिए, जब सामान्य तरीके से समन की तामील कराने के प्रयास आवश्यक रूप से किए जा चुके हों।
