दिल्ली: देश में इन दिनों चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर चर्चा तेज है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य के कारण चीनी का बड़ा हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है और इसी वजह से चीनी महंगी हो रही है। लेकिन सरकार ने इस दावे को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे एथेनॉल से ज्यादा सप्लाई को लेकर चिंता, उत्पादन में कमी और जमाखोरी जैसे कारण बताए जा रहे हैं।
एक महीने में 15% से ज्यादा बढ़ी चीनी की कीमत
भारत में चीनी की औसत कीमत में पिछले एक महीने में 15 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। 20 अगस्त को देश में चीनी की औसत कीमत करीब 55.7 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई। वहीं दिल्ली में खुदरा कीमत 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर जाने की बात सामने आई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में चीनी की कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है। हालांकि, इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा हाल के कुछ दिनों में देखने को मिला है।
नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (NCDEX) के मुताबिक, प्रमुख चीनी व्यापार केंद्र कोल्हापुर में 20 अगस्त को चीनी का थोक भाव करीब 5,750 रुपये प्रति क्विंटल रहा।
सरकार को क्यों देनी पड़ी ड्यूटी-फ्री आयात की मंजूरी?
चीनी की कीमतों में अचानक आए उछाल के बीच सरकार ने करीब एक दशक में पहली बार 10 लाख मीट्रिक टन (LMT) चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है।
इसके अलावा जमाखोरी पर लगाम लगाने के लिए थोक खरीदारों और डीलरों के पास चीनी के स्टॉक की सीमा तय की गई है। चीनी मिलों में मौजूद स्टॉक के फिजिकल वेरिफिकेशन का आदेश भी दिया गया है।
इन कदमों का उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और कृत्रिम रूप से कीमत बढ़ाने की कोशिशों पर रोक लगाना है।
चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शामिल है और घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल करीब 270-297 LMT चीनी की आवश्यकता होती है।
मौजूदा कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी चिंता उत्पादन में अनुमान से कमी और सप्लाई को लेकर आशंका को माना जा रहा है। देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ और कुछ क्षेत्रों में कम बारिश ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम संबंधी परिस्थितियों का असर फसल पर पड़ा है। इसके अलावा जमाखोरी की आशंका ने भी बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
गन्ने का उत्पादन अनुमान से कितना कम?
सरकार के अनुसार मौजूदा सीजन में देश में चीनी का उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने का अनुमान है। शुरुआती अनुमान करीब 343 LMT था।
उत्पादन में कमी के पीछे गन्ने में लगने वाली रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ-साथ अत्यधिक बारिश के कारण खेतों में पानी भरने को भी वजह बताया गया है।
उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई है। राज्य देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है। वहीं महाराष्ट्र के सोलापुर, लातूर, नंदुरबार, बीड, परभणी और अहमदनगर जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में भी 21 अगस्त तक बारिश की कमी रही।
कर्नाटक, जो देश का तीसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है, वहां इस साल सामान्य से करीब 22 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है।
फिर एथेनॉल की वजह से बढ़ी चीनी की कीमत?
सोशल मीडिया पर चीनी की कीमत बढ़ने के लिए पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को जिम्मेदार बताया जा रहा है। तर्क यह है कि चीनी मिलें गन्ने से बनी चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में कर रही हैं, जिससे बाजार में चीनी की उपलब्धता घट रही है।
हालांकि सरकार के आंकड़े इस दावे को पूरी तरह समर्थन नहीं करते। सरकार ने 21 अगस्त को बताया कि 2025-26 में देश में उत्पादित कुल चीनी का करीब 9 प्रतिशत हिस्सा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया गया।
इसके अलावा एथेनॉल उत्पादन में भी बदलाव आया है। सरकार के अनुसार, देश में उत्पादित एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से आता है।
यानी मौजूदा समय में चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे केवल एथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना सही तस्वीर नहीं दिखाता। गन्ने के उत्पादन में कमी, मौसम की मार, सप्लाई को लेकर चिंता और संभावित जमाखोरी भी कीमतों पर असर डालने वाले प्रमुख कारण हैं।
अक्टूबर तक पर्याप्त स्टॉक का दावा
सरकार ने यह भी कहा है कि अनुमान से कम उत्पादन के बावजूद अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए देश में पर्याप्त चीनी स्टॉक मौजूद है। हालांकि, सरकार की ओर से इस स्टॉक की कुल मात्रा सार्वजनिक नहीं की गई है।
अब सरकार की नजर चीनी के स्टॉक, बाजार में सप्लाई और जमाखोरी पर है। वहीं ड्यूटी-फ्री आयात की मंजूरी से घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ने और कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद की जा रही है।
