रायपुर: आम लोगों के लिए सीढ़ियां चढ़ना या गाड़ी की मरम्मत कराना भले ही रोजमर्रा की बात हो, लेकिन दिव्यांगजनों के लिए यही काम बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी जरूरत को समझते हुए रायपुर में पहला दिव्यांग गैरेज शुरू किया गया है, जहां दिव्यांगजनों के उपकरणों की मरम्मत निःशुल्क की जाएगी—और खास बात यह है कि यह केंद्र स्वयं दिव्यांगजन ही संचालित कर रहे हैं।
यह पहल प्रधानमंत्री Narendra Modi के ‘सुगम्य भारत अभियान’ की भावना को आगे बढ़ाती है। मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai के निर्देश पर रायपुर कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने इस विशेष गैरेज की स्थापना कराई है। इसका नाम रखा गया है ‘संबल’।
🛠️ क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी?
दिव्यांग गैरेज ‘संबल’ में निम्न उपकरणों की मरम्मत की जा रही है:
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मोटराइज्ड और हस्तचालित ट्राइसाइकल
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व्हीलचेयर
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कॉक्लियर इम्प्लांट सामग्री
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चश्मा मरम्मत
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कृत्रिम अंग (फुट पीस, सॉकेट, हाईट एडजेस्टमेंट)
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कैलीपर्स (बेल्ट, पैडिंग और ऊंचाई सुधार)
इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर पार्ट्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं। जल्द ही यहां आर्टिफिशियल लिम्ब्स बनाने की मशीन भी स्थापित की जाएगी।
👨🔧 दिव्यांगजन ही चला रहे हैं केंद्र
इस पहल की सबसे खास बात यह है कि पूरा संचालन दिव्यांगजन कर रहे हैं।
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कुलदीप मिंज (90% दिव्यांग) उपकरणों की मरम्मत का कार्य संभालते हैं। एक दुर्घटना में दोनों पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने कृत्रिम पैरों के सहारे न केवल खुद को संभाला, बल्कि अब दूसरों के लिए सहारा बने हैं।
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चंद्रपाल मानिकपुरी (80% दिव्यांग) डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं और आने वाले हर जरूरतमंद की समस्या दर्ज करते हैं।
🙏 लाभार्थियों ने जताया आभार
दिव्यांग करण सोनी ने बताया कि पहले ट्राइसाइकल की मरम्मत के लिए भटकना पड़ता था और पुर्जे महंगे मिलते थे, लेकिन ‘संबल’ में उनका वाहन निःशुल्क ठीक हुआ।
इसी तरह हिरौंदी साहू की बैटरी चालित ट्राइसाइकल में खराबी आने पर यहां मुफ्त मरम्मत की गई, जिसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री और प्रशासन को धन्यवाद दिया।
📅 घोषणा से शुरुआत तक
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 1 अक्टूबर (वृद्धजन दिवस) को इस दिव्यांग गैरेज की घोषणा की थी और 3 दिसंबर को इसकी औपचारिक शुरुआत हुई। निगम की पुरानी जर्जर इमारत को मरम्मत कर नए रूप में तैयार किया गया है।
🔴 रायपुर का ‘संबल’ सिर्फ एक गैरेज नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और संवेदनशील शासन की मिसाल बनकर उभरा है—जहां दिव्यांगजन अब किसी पर निर्भर नहीं, बल्कि खुद दूसरों का सहारा बन रहे हैं।
