नई दिल्ली। दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। इस दिन लोग भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा करते हैं। साथ ही सोना, चांदी, बर्तन और अन्य शुभ वस्तुओं की खरीदारी करना भी बेहद मंगलकारी माना जाता है। लेकिन इस बार धनतेरस पर एक ऐसा विशेष संयोग बन रहा है, जिसने पूजा-पाठ के नियमों को लेकर श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, 6 नवंबर 2026 को धनतेरस के साथ प्रदोष व्रत भी पड़ रहा है। प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि शाम को पूजा के समय सबसे पहले माता लक्ष्मी और कुबेर की आराधना करनी चाहिए या फिर भगवान शिव का पूजन करना चाहिए? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष संयोग में पूजा का क्रम महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए जानते हैं धनतेरस 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा से जुड़े जरूरी नियम।
धनतेरस पर पहले किसकी पूजा करें, महादेव या माता लक्ष्मी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ पूजा और अनुष्ठान की शुरुआत सबसे पहले भगवान गणेश के स्मरण और पूजन से करनी चाहिए। गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है और उनकी आराधना से पूजा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की जाती है।
इसके बाद प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का वह समय होता है, जिसे भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
इसलिए इस विशेष संयोग में प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार पहले गणेश जी का स्मरण करें, फिर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करें। इसके बाद भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की आराधना की जा सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि पूजा के इसी क्रम को सभी धर्मग्रंथों में अनिवार्य नियम नहीं बताया गया है। अलग-अलग परंपराओं और पंचांगों के अनुसार पूजा की विधि में अंतर हो सकता है।
धनतेरस 2026: जानिए तिथि और पूजा के शुभ मुहूर्त
इस साल धनतेरस का पर्व 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इसी दिन प्रदोष व्रत का भी संयोग रहेगा। नई दिल्ली के अनुसार दिए गए मुहूर्त इस प्रकार हैं।
- धनतेरस और प्रदोष व्रत: शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
- त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 6 नवंबर, सुबह 10:30 बजे
- त्रयोदशी तिथि समाप्त: 7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे
- प्रदोष काल: शाम 5:33 बजे से रात 8:09 बजे तक
- लक्ष्मी-कुबेर पूजन का स्थिर लग्न मुहूर्त: शाम 6:02 बजे से रात 7:57 बजे तक
- यम दीपदान: 6 नवंबर को प्रदोष काल में, स्थानीय परंपरा के अनुसार
ध्यान रखें कि ये समय नई दिल्ली के अनुसार दिए गए हैं। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त और लग्न के समय के कारण मुहूर्त में अंतर हो सकता है।
कैसे करें भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा?
प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। धार्मिक परंपरा के अनुसार हल्के पीले या सफेद वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में भगवान शिव के शिवलिंग या शिव परिवार की तस्वीर स्थापित करें।
प्रदोष काल में शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध और सफेद चंदन अर्पित करें। इसके बाद अक्षत, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाएं। भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का 108 बार जाप करें। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की विधि
शिव परिवार की पूजा के बाद धनतेरस का मुख्य पूजन करें। इसके लिए लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
पूजा के दौरान रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत और कमल का फूल अर्पित करें। भगवान को खीर या मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन खरीदे गए सोने-चांदी के आभूषण, पीतल के बर्तन और अन्य नई वस्तुओं को भी पूजा में शामिल कर सकते हैं। साबुत धनिया अर्पित करने की भी परंपरा है।
माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इस मंत्र का जाप कर सकते हैं।
‘ॐ ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः’
इसके बाद भगवान धन्वंतरि और कुबेर देव की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
धनतेरस पर यम दीपदान का भी है विशेष महत्व
धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाया जाता है। इसे यम दीपदान कहा जाता है।
इसके लिए आटे या मिट्टी का दीपक तैयार करके उसमें तेल और बाती डालें। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर दीपक प्रज्वलित करें। मान्यता है कि यमराज के निमित्त दीपदान करने से परिवार पर अकाल मृत्यु का भय टलता है। यह धार्मिक आस्था से जुड़ी मान्यता है।
धनतेरस पर भूलकर भी न करें ये गलतियां
धनतेरस और प्रदोष व्रत के इस संयोग में पूजा करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण से करनी चाहिए। प्रदोष व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को प्राथमिकता दें।
पूजा के समय दिशा का ध्यान रखें। शिव और लक्ष्मी पूजन के दौरान परंपरा के अनुसार उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ सकते हैं। वहीं यम दीपदान के लिए दक्षिण दिशा का विधान माना जाता है।
इसके अलावा घर में साफ-सफाई रखें और पूजा के दौरान सात्विक वातावरण बनाए रखें। परिवार में विवाद और कटु वचन से बचें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस के दिन सकारात्मकता, संयम और श्रद्धा के साथ पूजा करना शुभ माना जाता है।
प्रदोष और धनतेरस का संयोग क्यों है खास?
धनतेरस को आरोग्य, धन और समृद्धि का पर्व माना जाता है, जबकि प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। ऐसे में दोनों पर्वों का एक ही दिन पड़ना श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की श्रद्धापूर्वक आराधना करने से जीवन में सुख, शांति, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना पूरी होती है। इसलिए धनतेरस पर पूजा करते समय सही तिथि, स्थानीय शुभ मुहूर्त और अपनी पारिवारिक परंपराओं का ध्यान जरूर रखें।
