मुंबई के मलाड-कुरार इलाके में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस को भी हैरान कर दिया। करीब डेढ़ महीने से बंद पड़े एक डे-केयर सेंटर में मंगलवार 29 सितंबर की सुबह पुलिस पहुंची तो अंदर से तेज दुर्गंध आ रही थी। कमरे का ताला खोला गया तो भीतर एक शव देखकर पुलिसकर्मी भी चौंक गए। शुरुआती तौर पर मामला किसी गंभीर अपराध से जुड़ा हुआ नजर आया, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो इसके पीछे हत्या से ज्यादा एक परिवार की ऐसी कहानी सामने आई, जिसमें मौत के बाद भी उम्मीद खत्म नहीं हुई थी।
बताया जा रहा है कि बरामद शव करीब चार साल पहले मर चुके परिवार के मुखिया का था। परिवार के मुताबिक उनकी मौत अचानक कार्डियक अरेस्ट से हुई थी। पिता की मौत के बाद उनका बेटा इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाया कि अब वह कभी वापस नहीं आएंगे। इसी उम्मीद में परिवार ने उनके शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का फैसला किया।
मौत के बाद भी बेटे ने नहीं छोड़ी उम्मीद
पुलिस की शुरुआती जानकारी के मुताबिक, परिवार में से एक बेटा डॉक्टर और दूसरा वैज्ञानिक है। परिवार कथित तौर पर इस उम्मीद में था कि भविष्य में मेडिकल साइंस इतनी तरक्की कर सकती है कि मृत व्यक्ति को दोबारा जीवन देने की कोई तकनीक विकसित हो जाए।
इसी सोच के चलते परिवार ने क्रायोनिक्स के बारे में विचार किया। कथित तौर पर पिता के शव को अमेरिका की किसी क्रायोनिक्स सुविधा तक भेजने की योजना भी बनाई गई थी। हालांकि, विदेश भेजने की कानूनी औपचारिकताओं, खर्च और अन्य प्रक्रियाओं के चलते यह योजना पूरी नहीं हो सकी।
इसके बाद शव को बंद पड़े सेंटर के एक रेफ्रिजरेटर में सुरक्षित रखने की कोशिश की गई। परिवार ने कथित तौर पर शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए रसायनों और अन्य तरीकों का इस्तेमाल किया।
चार साल तक बंद कमरे में चलता रहा इंतजार
पिता के शव को करीब चार साल तक एक बंद कमरे में रखा गया। इस दौरान परिवार के मन में उम्मीद बनी रही कि शायद भविष्य का विज्ञान मौत के बाद भी जिंदगी लौटाने का रास्ता खोज लेगा।
लेकिन मौजूदा वैज्ञानिक स्थिति यह है कि क्रायोनिक्स के जरिए किसी मृत इंसान को सफलतापूर्वक दोबारा जीवित करने का कोई प्रमाणित उदाहरण नहीं है। क्रायोनिक्स एक प्रयोगात्मक अवधारणा है, जिसमें मृत्यु के बाद शरीर या मस्तिष्क को बेहद कम तापमान पर संरक्षित करने की कोशिश की जाती है। इसका उद्देश्य भविष्य की संभावित वैज्ञानिक प्रगति पर निर्भर करता है।
पुलिस को ऐसे मिली शव की जानकारी
मंगलवार 29 सितंबर को पुलिस ने करीब डेढ़ महीने से बंद पड़े डे-केयर सेंटर का ताला खोला। अंदर से दुर्गंध आने के बाद पुलिस ने कमरे की तलाशी ली और शव बरामद किया। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई।
शुरुआत में शव मिलने की परिस्थितियां बेहद संदिग्ध नजर आईं, लेकिन पुलिस की पड़ताल में परिवार और शव को सुरक्षित रखने के पीछे की कथित वजह सामने आई। अब जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि शव को इतने लंबे समय तक वहां रखने के लिए किन प्रक्रियाओं और अनुमतियों का पालन किया गया था।
अब पिता को दी जाएगी अंतिम विदाई
पुलिस की जांच और मौजूदा परिस्थितियों के बाद परिवार अब मृतक के शव को मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार सुपुर्द-ए-खाक करने की तैयारी कर रहा है। चार साल तक जिस शरीर को भविष्य की चिकित्सा तकनीक के भरोसे सुरक्षित रखा गया, अब उसे अंतिम विदाई दी जाएगी।
यह घटना कई प्रशासनिक सवाल भी खड़े करती है। बंद पड़े परिसर में इतने लंबे समय तक शव कैसे रखा रहा, संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई और अस्पताल या सेंटर को बंद करते समय इसकी जांच कैसे नहीं हुई, इन सवालों के जवाब जांच के बाद सामने आ सकते हैं।
क्या है क्रायोनिक्स?
क्रायोनिक्स में मृत व्यक्ति के शरीर या मस्तिष्क को बेहद कम तापमान पर संरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। आम तौर पर इसके लिए तरल नाइट्रोजन के तापमान के आसपास यानी करीब माइनस 196 डिग्री सेल्सियस का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके पीछे विचार यह है कि भविष्य में चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित हो सकता है कि शरीर या मस्तिष्क को हुई क्षति की मरम्मत कर किसी व्यक्ति को फिर से जीवन दिया जा सके। हालांकि, वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में ऐसा करने की कोई सिद्ध तकनीक मौजूद नहीं है।
क्रायोनिक्स के इतिहास में जेम्स बेडफोर्ड का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। 12 जनवरी 1967 को उनके शरीर को क्रायोनिक संरक्षण में रखा गया था। इसके बाद भी कई लोगों ने भविष्य में संभावित वैज्ञानिक प्रगति की उम्मीद में अपने शरीर या मस्तिष्क के संरक्षण की व्यवस्था कराई है।
एक कमरे में सिर्फ शव नहीं, चार साल की उम्मीद भी थी
कुरार का यह मामला सिर्फ पुलिस जांच या क्रायोनिक्स की वैज्ञानिक अवधारणा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बेटे की उस भावनात्मक स्थिति की कहानी भी सामने आती है, जो अपने पिता की मौत को स्वीकार नहीं कर पाया।
चार साल तक एक बंद कमरे में रखा शरीर शायद विज्ञान के उस चमत्कार का इंतजार कर रहा था, जो आज तक संभव नहीं हुआ। परिवार को उम्मीद थी कि एक दिन विज्ञान मौत को मात देने का रास्ता खोज लेगा।
लेकिन अब वह इंतजार खत्म होने जा रहा है। पिता को अंतिम विदाई दी जाएगी और चार साल से बंद कमरे में संभालकर रखी गई उस उम्मीद का भी अंत होगा, जिसने परिवार को मौत की सच्चाई स्वीकार करने से रोक रखा था।
