रायगढ़। भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, और इसके केंद्र में कोयले की बढ़ती मांग है। इसी चुनौती का सामना करते हुए कोयला मंत्रालय ने भूमिगत खनन (अंडरग्राउंड माइनिंग) को बढ़ावा देने की पहल की है, जो न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में सहायक है, बल्कि पर्यावरण, खेती और वन्य जीवन के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही है।
सतह की हरियाली और खेती बनी रहेगी सुरक्षित
भूमिगत खनन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जमीन की ऊपरी सतह पर कोई नुकसान नहीं होता। खनन प्रक्रिया 500 से 2000 फीट की गहराई में होती है, जिससे ऊपर की भूमि, पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं। ग्रामीणों के लिए यह राहत की बात है क्योंकि उनकी खेती, फसलें और वनोपज जैसे महुआ और तेंदू पत्ता पहले की तरह ही सुरक्षित रहेंगे।
वन्य जीवन पर नहीं पड़ेगा असर
भूमिगत खनन में भारी मशीनों या विस्फोटक का इस्तेमाल नहीं होता, जिससे जंगलों में हाथी, हिरण, सियार और पक्षियों का आवास प्रभावित नहीं होता। प्राकृतिक आवागमन जारी रहता है और पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है।
धूल और वायु प्रदूषण में कमी
ओपन कास्ट माइनिंग के मुकाबले भूमिगत खनन में धूल और शोर सतह तक नहीं पहुँचते। आसपास के गाँवों में वायु गुणवत्ता बेहतर रहती है, ग्रामीणों को स्वच्छ हवा मिलती है और पेड़-पौधे भी बेहतर पनपते हैं।
जल स्रोत और मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी
खनन 500 फीट या उससे अधिक गहराई में होने के कारण भूजल पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता। निकाले गए पानी को फिल्टरिंग सिस्टम के माध्यम से शुद्ध करके ग्रामीणों के लिए उपयोगी बनाया जाता है। ऊपरी जमीन की मिट्टी बिना क्षतिग्रस्त हुए बनी रहती है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित नहीं होता।
सतत विकास की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत खनन भविष्य में भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरा करने के साथ-साथ जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है। यह साबित करता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ संभव हैं।
भूमिगत खनन यह संदेश देता है कि विकास हमेशा प्रकृति के साथ तालमेल में चल सकता है, और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—विकास भी, हरियाली भी।
