सुसाइड नोट में छिपा था प्रताड़ना का राज, जान से मारने और तेजाब फेंकने की धमकी का मामला पहुंचा हाईकोर्ट; दोषी की अपील खारिज, 4 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

 

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला को लगातार प्रताड़ित करने और जान से मारने के साथ तेजाब फेंकने की धमकी देने से जुड़े आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने निचली अदालत से मिली पांच साल के कारावास और जुर्माने की सजा बरकरार रखते हुए आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। 9 अक्टूबर 2026 को दिए गए फैसले में जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के आचरण और महिला की आत्महत्या के बीच आवश्यक संबंध स्थापित करते हैं।

यह मामला मंजू शर्मा की मौत से जुड़ा है, जिन्होंने 24 मई 2013 को रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में सल्फास की गोलियां खा ली थीं। उन्हें उपचार के लिए डॉ. बीआर अंबेडकर स्मृति अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस को उनके पर्स से सुसाइड नोट, सल्फास की गोलियों का पाउच और अन्य सामान मिला था। विसरा की रासायनिक जांच में एल्युमिनियम फॉस्फाइड की पुष्टि हुई, जो सल्फास के सेवन से संबंधित था।

सुसाइड नोट में आरोपी को ठहराया गया जिम्मेदार

अभियोजन के अनुसार, मंजू शर्मा ने सुसाइड नोट में बबली सिंह उर्फ बबलू सिंह को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। नोट में आरोपी की ओर से लगातार परेशान किए जाने और गंभीर धमकियां दिए जाने का उल्लेख था। अभियोजन ने अदालत को बताया कि महिला को जान से मारने और तेजाब फेंकने जैसी धमकियां दी गई थीं।

मामले में यह भी सामने आया कि मंजू शर्मा विवाहित थीं और उनके पति के साथ संबंध तनावपूर्ण थे। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने उनकी इस परिस्थिति का फायदा उठाकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में उन्हें प्रताड़ित करने लगा। गवाहों के बयानों के जरिए भी अभियोजन ने कथित प्रताड़ना से जुड़े तथ्यों को अदालत के सामने रखा।

हस्ताक्षर की जांच रिपोर्ट भी बनी अहम साक्ष्य

सुनवाई के दौरान अभियोजन ने मृतका के परिजनों के बयान और सुसाइड नोट पर मौजूद हस्ताक्षरों की विशेषज्ञ जांच रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में नोट के हस्ताक्षरों का मृतका के बैंक खाते से संबंधित दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षरों से मिलान होने की बात सामने आई। इन साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन ने सुसाइड नोट की विश्वसनीयता और उसमें दर्ज आरोपों को साबित करने का प्रयास किया।

वहीं, बचाव पक्ष ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए दोषसिद्धि को चुनौती दी। राज्य की ओर से दलील दी गई कि मृतका को लगातार प्रताड़ित किया गया और गंभीर धमकियां दी गईं, जिनका उसकी आत्महत्या से संबंध था।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के हर मामले में सामान्य विवाद या प्रताड़ना का आरोप अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन को आरोपी के आचरण, उसकी मंशा और आत्महत्या के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना जरूरी है।

इस मामले में अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य किसी एक विवाद या क्षणिक गुस्से की ओर इशारा नहीं करते, बल्कि आत्महत्या से पहले लगातार प्रताड़ना और गंभीर धमकियों का सिलसिला सामने आया। सुसाइड नोट में आरोपी को जिम्मेदार ठहराया जाना, गवाहों के बयान और हस्ताक्षरों की विशेषज्ञ जांच रिपोर्ट भी मामले के महत्वपूर्ण पहलू रहे।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन आरोपी के कृत्यों और आत्महत्या के बीच आवश्यक संबंध तथा उकसाने की मंशा साबित करने में सफल रहा। अदालत को निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला। इसी के साथ आरोपी की अपील खारिज कर दी गई।

चार सप्ताह में आत्मसमर्पण करना होगा

हाईकोर्ट ने जमानत पर बाहर चल रहे आरोपी को शेष सजा भुगतने के लिए चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने की स्थिति में ट्रायल कोर्ट आरोपी को हिरासत में लेकर सजा लागू कराने की कार्रवाई करेगा।

इस फैसले के साथ निचली अदालत द्वारा सुनाई गई पांच साल के कारावास और जुर्माने की सजा बरकरार रहेगी। अदालत के आदेश ने स्पष्ट कर दिया कि मामले में पेश किए गए साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर दोषसिद्धि को निरस्त करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।

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