आरंग। आरंग में जमीन के एक विवाद ने अब तूल पकड़ लिया है। करीब 2 एकड़ बेशकीमती जमीन को लेकर एक तरफ 80 वर्षीय उर्मिला बाई और 85 वर्षीय चमेली बाई अपने परिवार के साथ इसे पुश्तैनी जमीन बता रही हैं, तो दूसरी ओर आवेदक अरविंद शर्मा का दावा है कि संबंधित भूमि कभी शासकीय ‘घास मद’ में दर्ज थी। शर्मा ने इसी आधार पर बाद में हुए नामांतरण को रद्द करने की मांग की है।
दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बीच मामला राजस्व अधिकारियों तक पहुंचा। वहीं, परिवार की ओर से मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हैं, जिन्हें अरविंद शर्मा ने खारिज किया है।
बुजुर्ग महिलाओं का दावा- पीढ़ियों से जमीन पर कब्जा
उर्मिला बाई और चमेली बाई के परिवार का कहना है कि संबंधित भूमि उनके पूर्वजों के समय से उनके कब्जे और उपयोग में रही है। परिवार के मुताबिक, खेती और जमीन से होने वाली आय ही उनके जीवन-यापन का प्रमुख आधार रही है।
परिजनों का आरोप है कि वर्षों से चल रहे विवाद के कारण दोनों बुजुर्ग महिलाओं को मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बीच जमीन से जुड़े कागजी और कानूनी विवाद ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
परिवार ने यह भी आरोप लगाया है कि अरविंद शर्मा और उनके सहयोगियों की ओर से उन पर मामले को वापस लेने और विवाद खत्म करने के लिए दबाव बनाया गया। हालांकि, ये आरोप परिवार की ओर से लगाए गए हैं।
राजस्व रिकॉर्ड में अलग-अलग खसरा नंबर
मामले में उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और ऑनलाइन प्रविष्टियों के अनुसार, पूर्व में खसरा नंबर 904/1, 904/2, 904/3 और 904/4 दर्ज रहे हैं। वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड में भूमि खसरा नंबर 904/1 से 904/7 तक अलग-अलग हिस्सों में दर्ज बताई गई है।
परिवार और किसानों का कहना है कि संबंधित क्षेत्र में कई परिवार लंबे समय से खेती-किसानी करते आ रहे हैं और उनके नाम भूमिस्वामी हक में दर्ज हैं। उनका आरोप है कि वर्षों से चली आ रही स्थिति के बावजूद अब जमीन के रिकॉर्ड को लेकर आपत्तियां उठाई जा रही हैं।
राजस्व न्यायालय में क्या हुआ?
मामला अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), आरंग के समक्ष भी पहुंचा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अरविंद शर्मा ने दावा किया था कि वर्ष 1929 में संबंधित भूमि ‘घास मद’ यानी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज थी। उनका सवाल था कि बाद में इस जमीन पर निजी व्यक्तियों के नाम किस आधार पर दर्ज हुए।
मामले की सुनवाई के दौरान राजस्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड की जांच की गई। आदेश के मुताबिक, वर्ष 1954-55 और 1995-96 से भूमि उर्मिला बाई, चमेली बाई पति लखन तथा उनके पूर्वजों के नाम भूमिस्वामी हक में दर्ज होने की बात सामने आई।
आदेश में यह भी कहा गया कि आवेदक की ओर से पुराने रिकॉर्ड से संबंधित अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज या सक्षम प्राधिकारी का आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके आधार पर एसडीओ (राजस्व), आरंग ने अरविंद शर्मा की याचिका को निरस्त कर नस्तीबद्ध कर दिया।
परिवार का आरोप- कानूनी प्रक्रिया में उलझाया जा रहा मामला
परिवार का कहना है कि तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर उनके पक्ष में आदेश आने के बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ है। परिजनों का आरोप है कि मामले को आगे उच्च राजस्व अधिकारियों के समक्ष ले जाकर उन्हें लगातार कानूनी प्रक्रिया में उलझाया जा रहा है।
उनका कहना है कि लंबे समय तक चलने वाली कार्रवाई से सबसे ज्यादा परेशानी उम्रदराज महिलाओं को हो रही है।
अरविंद शर्मा बोले- सिर्फ रिकॉर्ड की जांच चाहता हूं
वहीं, आवेदक अरविंद शर्मा ने परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को परेशान करना नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जमीन के स्वरूप और बाद में हुए नामांतरण की प्रक्रिया की जांच कराना है।
शर्मा के अनुसार, यदि भूमि पहले शासकीय ‘घास मद’ में दर्ज थी तो बाद में उस पर भूमिस्वामी का नाम किस प्रक्रिया और आधार पर दर्ज हुआ, इसकी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक प्रशासन की ओर से इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक वे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते रहेंगे।
फिलहाल जमीन के स्वामित्व और पुराने राजस्व रिकॉर्ड को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। उपलब्ध राजस्व आदेश में एक पक्ष की याचिका खारिज किए जाने का उल्लेख है, जबकि दूसरे पक्ष की ओर से पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जांच की मांग जारी रखने की बात कही गई है।
